दस्तकें दें-दें थकेगा एक दिन यह इंकलाब,
गर जलालत इस तरह सहते रहेंगे आदमी।
तागड़ धिना…तागड़ धिना ता…ता…ता..!26 जनवरी के दिन सोचता हूं कि जिंदगी का छब्बीसवां पैकेज बाइट पर नहीं एंबियंस पर काटूं।भले ही पत्थर-सी मांसपेशियां नहीं हैं, ना ही लोहे-से अभय भुजदंड हैं लेकिन नस-नस में आग की लहर तो है( यानी दिनकर की कंचनी कसौटी पर खरा उतरता हूं)। उस आग-अलाव के साथ-साथ सपने जगते रहते हैं, जलते रहते हैं। मैं भारतवर्ष के 54 करोड़ युवाओं में शामिल एक आम युवा हूं(आम इसलिए कि सोनिया गांधी की तरह मुझे हर महीने में पचास हजार चिट्ठियां नहीं आतीं), जिसे इस बात का पक्का और पूरा भरोसा है कि जिन्हें लोग किताबी और ख्याली बातें कहते हैं, उन्हें भी साक्षात किया जा सकता है। चाहे दुनिया अपने पके बालों का लाख हवाला देते फिरे । बकौल अंका-
राह-राह में कदम-कदम पर, दफ्तर या दुकानों में-
लोग सयाने दीवानों को कुछ से कुछ समझाते हैं।
मैं उन लोगों की फेहरिस्त में नहीं शामिल होना चाहता, जो तमाम उम्र हालात को कोसते और दूसरों को दोष देते फिरते हैं या फिर किनारे बैठकर तमाशाई बने रहते हैं, दूसरे शब्दों में बुद्धिजीवी बन जाते हैं, व्यावहारिक होने का गर्व महसूस कर मुस्कान बिखेरते हैं। देश के करोड़ों लोगों की तरह मेरी भी कमजोरियां हैं, सीमाएं हैं, मुंह मोड़ने के लिए तमाम वजहें भी हैं। फिर भी छोटी-छोटी चीजें करना चाहता हूं, अपने वतन के लिए, बिना बताए, चुपचाप।यथा शक्ति, तथा भक्ति।
अंधेरे पर क्यूं झल्लाएं,
अच्छा हो एक दीप जलाएं।
करीब ढ़ाई हजार साल पहले कवि संत तिरुवल्लुवर की लिखी पंक्तियां मुझे बचपन में पढ़ने को मिलीं, जिसका अर्थ बाद में काफी पूछताछ के बाद पता चला-
वेल्लथ थनैया मलारनीतम मानधर्थम उल्लथ थनैया थुयारवू।(यानी नदी या झील या ताल की गहराई, जल की स्थिति चाहे जो भी हो, लिली फूल हमेशा बाहर निकलता है)। या किसी कवि की शब्दों में यूं कहें कि-
क्या पतझर के बाद वसंत का आगमन नहीं होगा? अवश्य होगा..!
मार्क्स के मुताबिक- जो जैसा जीवन जीता है, उसकी चेतना वैसी होती चली जाती है। बचपन भले ही स्वामी विवेकानंद, नेताजी सुभाष, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, इकबाल और मार्क्स को पढ़ते हुए गुजरा हो, लेकिन कड़वा सच यही है कि उन लोगों की तरह देश को कुछ दे जाने का माद्दा मुझमें नहीं है। साथ ही जिंदगी दुनिया की खुरदरी सच्चाईयों के साथ गुजरी हैं, इसके बावजूद इतना समझदार नहीं हो पाया कि उनकी बातों को कागद की लेखी मानकर भूल जाऊं और समझदारों की बिरादरी में शामिल हो जाऊं। या खो जाउं उन लोगों की भीड़ में, जो बातें तो बहुत बनाते हैं और उनसे होता कुछ नहीं है। आप माने या ना माने, लेकिन असलियत यही है कि सपने शिथिल नहीं हुए हैं। शायद इसलिए आपसे संवाद की जरूरत है।
विज्ञान का छात्र होने के कारण समझता हूं कि भौतिकी में यदि दो फ्रीक्वेंसी मैच करती है तो अनुनाद होता है।
अपनी बातें लोगों के सामने रखे जाने पर बुद्धिविलास का इल्जाम मढ़े जाने का खतरा तो है पर-
कहना तो वही है जो मेरी लहू में है,
चाहे आप कुछ भी कहें हमारे बयान पर।
हम तो ऐसे हैं भइया।
अपने देशवासियों की तरह मैं भी गणतंत्र दिवस का जश्न तहे दिल से मनाता हूं, लेकिन ना चाहते हुए भी विचारों का जंप कट लग ही जाता है। आजादी के परवानों के लिए आजादी का मतलब महज अंग्रेजों से मुक्ति नहीं था। उनका संकल्प था- समाज की जड़ों में पैठी उन बुराईयों को निकाल फेंकना, जिनकी वजह से हमारे वतन की हंसी-खुशी पर खतरा पैदा होता है। टीस की बात ये रही कि 15 अगस्त सन् 1947 को हमने मान लिया कि हम पूरी तरह आजाद हो गए। पर हकीकत यही है कि हम अब भी गणतंत्र भारत के परतंत्र नागरिक हैं। निचली अदालत में भगतसिंह ने क्रांति का मतलब बखूबी समझाया था।
क्रांति के लिए खूनी लड़ाईयां जरूरी नहीं है और न ही इसमें व्यक्तिगत हिंसा के लिए कोई जगह है। वह बम और पिस्तौल का संप्रदाय भी नहीं है। क्रांति के मायने हैं- अन्याय और भ्रष्टाचार पर आधारित समाज में आमूल परिवर्तन।
बदलाव की जरूरत से किसी को इंकार नहीं हो सकता लेकिन पहल भी तो हमें ही करनी होगी।
कंचनजंघा की चमकती चोटी को देखना हो तो दार्जिलिंग जाना ही पड़ेगा।
जिन महानुभावों को हमने देश का पथ प्रदर्शक या जनवादी भाषा में नेता बनाकर देश की जिम्मेदारी सौंप दी, उनकी चर्चा करना किसी बहरे के सामने झुनझुने बजाना यानी समय बर्बाद करना भर है। वर्षों पहले सुनील दत्त से दिल्ली में मुलाकात के समय मैंने जब उनसे देश की राजनीति में युवाओं को भरपूर मौका दिए जाने की बात कही थी और आंकड़े के साथ-साथ दो-चार इंकलाबी सवाल दागे थे तो वो बस मुस्कुराकर रह गए। इस मसले पर देश के अधिकांश कर्णधारों की भंगिमा यही होती है। वो दलील देते फिरते हैं कि युवा इस काबिल हैं ही नहीं। यहां बरबस मुझे हरिकिशोर चतुर्वेदी की पंक्तियां याद आती हैं-
क्या आप भी उसी व्यवस्था के अंग हैं
जिनके इशारों पर जुगनुओं को ही
घोषित कर दिया गया है प्रकाश पुंजऔर
सूरज को अधेरों में गुम कर दिया गया है?
कब्र में पैर लटकाए तख्त पर बैठ चुके बुजुर्ग और खास लोगों ने देश के लिए कुछ भी खास किया हो, मुझे तो ऐसा नहीं लगता। आम लोगों ने ज्योहीं उन्हें सिर आंखों पर बिठाया(जिस तरह फ्रेम बनाते समय कैमरा का हेडरूम काटकर हम किसी का सिर ऊंचा कर देते हैं, गलती यहीं हुई) वो खास हो गए और आम लोगों के लिए उनमें नफरत की भावना पैदा हो गई। मुझे याद है- सुभाष घई को जब भारत के सिनेप्रेमियों ने राजकपूर के बाद दूसरा शो मैन घोषित कर दिया तो सन् 2001 में यादें फिल्म के रिलीज के मौके पर घई ने बयान दिया कि मैंने ये फिल्म पटना और भोपाल के रिक्शा खींचनेवालों के लिए नहीं बनाई है…(देशी आंखों से विदेशी सपने)। ये सुभाष घई का दंभ और अहंकार बोल रहा था। नतीजा सामने है। हालांकि उस वक्त महेश भट्ट ने कहा था कि- सुभाष घई नाम का ब्रांड मर रहा है और उसे जिंदा करने के लिए उन्हें चमत्कार करना होगा। खैर..! मेरे पैरों में घुंघरू बंधा दे तो फिर मेरी चाल देख ले। उदारीकरण के रास्ते खुलने के बाद तरक्की के अलावा और भी बहुत कुछ समझ में आ रहा है। बाजार का अपना मिजाज है। एक अच्छे और संवेदनशील अभिनेता होने के बावजूद शाहरुख खान को सिक्स पैक एब्स बनाने की जरूरत पड़ती है और दुनिया से मुखातिब होकर कहना पड़ता है कि- दिस मेक्स मी फील लाइक ए स्टार। ये समझ में भी आता है, पर जब 25 साल तक समाजवाद की सीख देते हुए राज्य की सत्ता का स्वाद चखनेवाले ज्योति बसु के दिमाग का पेंच अब अचानक दुरुस्त होता है(तकनीकी भाषा में यूं कहें कि जब उनके दिमाग का मॉनीटर कैलिब्रेटेड हो जाता है) तो फरमाते हैं कि समाजवाद अब सपना है और पूंजीवाद समय की जरूरत है। सच पूछिए तो मुझे हिंदी फिल्मों के रंग बदलते सारे खलनायक एक-एक कर याद आने लगते हैं। फिर मार्क्स के नुमाइंदे का मुलम्मा किसलिए? ये हैं माकपा के भारत रत्न। बड़-बड़ गेलन, बैजू अयलन। ऊपर से जनता की नब्ज को समझने का दंभ भरते हैं। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने 26 जनवरी, 1930 को जारी किए गए अपने घोषणा-पत्र में सशस्त्र क्रांति का विरोध किए जाने पर गांधीजी की ओर संकेत करते हुआ कहा था कि- कोई व्यक्ति जनसाधारण की विचारधारा को केवल मंचों से दर्शन और उपदेश देकर नहीं समझ सकता। वह तो केवल इतना ही दावा कर सकता है कि तरह-तरह के विषयों पर उसने अपनी बातें जनता के सामने रखीं। जनसमर्थन का दर्परखनेवाले बुद्धदेव भट्टाचार्य और ज्योति बसु को ज्यादा फुदकने से परहेज रखना चाहिए।
26 जनवरी के मौके पर इस पल मुझे अपना शहर याद आ रहा है, जहां लोग मुझे आदर्श कम इंकलाब नाम से ज्यादा जानते हैं। कोई- कोई मजाक में क्रांति कुमार भी कह डालता है। जितनी मुंह, उतनी बातें।
दरअसल आदर्श से आदर्श कुमार इंकलाब होने की भी अपनी कहानी है।छठी कक्षा का छात्र था, जब मैंने पहला जुलूस निकाला था। उस समय सीतामढ़ी के जिलाधिकारी सुधीर कुमार थे। मामला छोटा था और जोश जबरदस्त। दंडस्वरूप एक शिक्षक का तबादला काफी दूर कर दिया गया था, कलाकार थे वे, इसलिए हमें आगे आना पड़ा था। इसके अलावा स्कूल में सुविधाएं बढ़ाने के लिए भी दबाव डाला जाना था।मेरे पीछे-पीछे करीब डेढ़ सौ विद्यार्थी थे, नारे की गूंज में हमारी मांगें शामिल थीं।मेरा एक दोस्त था- इंदल, बुलंद आवाज का मालिक। मेरे मना करने के बावजूद हर चार-पांच नारे के बाद-एक तरफ से आदर्श कुमार……..तो दूसरी तरफ से जोर से आवाज आती- इंकलाब..!ऐसा वो मस्ती के मूड में कर रहा था, लेकिन ये गूंज रूह का संगीत बन गई। इस तरह आदर्श कुमार के साथ इंकलाब का रिश्ता हमेशा-हमेशा के लिए जुड़ गया।
(गरीबों का लहू
जो पसीना बनकर बहता है
ठंडी आह
जो फिजां में फैल जाती है
आकस्मिक मौत
जो अभाव में हो जाती है
सब हैं- मौन शहादत
जो विचारों की उर्जा देती है
अनुभूति का ताप बनती है
ज्वालामुखी विस्फोट बनकर
जड़ता की जमीन तोड़ती है
इंकलाब आता है।)
ये अलग बात है कि ये रिश्ता जब मुझ पर हंसता है तो सिर खुद-ब-खुद जमीन का दीदार करने लगता है। खैर, हमारी मांगे मानी गईं। अगले दिन क्षेत्रीय अखबार की पहली हेडलाइन हमारे जुलूस की खबर बनी। आज किडनी के व्यापार वाली खबर देखने के बाद मन खुद-ब-खुद ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाने लगा। भगत सिंह का लेख- मैं नास्तिक क्यों हूं?- की पंक्तियां भीतर घुमड़ने लगीं। फिर ट्रांजिशन प्लेट के साथ ख्यालों में गालिब आ धमके।
महरम नहीं है तू ही नवाहाए- राज का,
या वरना जो हिजाब है, पर्दा है साज का!
( मेरे हिसाब से ये शेर हकीकी शेर है- ऐ गालिब ये तेरा कुसूर है कि तू अल्लाह की हकीकत को नहीं पहचानता। वरना, उस ईश्वर के होने का सुबूत संसार की एक-एक चीज से जाहिर होता है। काश तुझमें भी इतनी समझ होती कि तू भी सच्चाई को पहचान सकता। तेरी मिसाल उस अनजान आदमी की तरह है, जो यह नहीं जानता कि सितार के तार से आवाज कैसे निकाली जाती है, पर एक जानकार उसके एक-एक तार से सैकड़ों आवाजें निकाल लेता है, जो उसमें छिपी हुई है।) फिर अपनी ताकत का एहसास होता है-
इंतजार की हद हो चुकी।
घुट-घुट कर जीते हुए दशकों बीत गए।
बदलाव की उम्मीद थी पर मिला तो सिर्फ धोखा।
आखिर कब तक छले जाते रहेंगे?
और कितना बर्दाश्त करेंगे?
दुनिया के भंवरजाल में आखिर कब तक फंसे रहेंगे?
नित-नई चुनौतियों से कब तक आंखे चुराए रहेंगे?
वक्त आवाज दे रहा है…नई क्रांति की नई राहें बाहें फैलाए इंतजार कर रही हैं।
तो आइए जागरूक बनें और नेताओं को बता दें कि-
हम महज एक वोट नहीं तुम्हारे भाग्य-विधाता हैं।
और तुम ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियां नहीं मना सकते!
क्रांति चिरंजीवी हो, जय हिंद, इंकलाब…जिंदाबाद!
गणतंत्र दिवस की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं!
आपका-
आदर्श कुमार इंकलाब