Monthly Archives: फ़रवरी 2009

अभी तूने वह कविता कहाँ लिखी है, जानेमन..!

 

अभी तूने वह कविता कहाँ लिखी है, जानेमन

मैंने कहाँ पढ़ी है वह कविता

अभी तो तूने मेरी आँखें लिखीं हैं, होंठ लिखे हैं

कंधे लिखे हैं उठान लिए

और मेरी सुरीली आवाज लिखी है

 

पर मेरी रूह फ़ना करते

उस शोर की बाबत कहाँ लिखा कुछ तूने

जो मेरे जिरह-बख़्तर के बावजूद

मुझे अंधेरे बंद कमरे में

एक झूठी तस्सलीबख़्श नींद में ग़र्क रखता है

 

अभी तो बस सुरमयी आँखें लिखीं हैं तूने

उनमें थक्कों में जमते दिन-ब-दिन

जिबह किए जाते मेरे ख़ाबों का रक्त

कहाँ लिखा है तूने

 

 

अभी तो बस तारीफ़ की है

मेरे तुकों की लय पर प्रकट किया है विस्मय

पर वह क्षय कहाँ लिखा है

जो मेरी निग़ाहों से उठती स्वर-लहरियों को

बारहा जज़्ब किए जा रहा है

 

अभी तो बस कमनीयता लिखी है तूने मेरी

नाज़ुकी लिखी है लबों की

वह बाँकपन कहाँ लिखा है तूने

जिसने हज़ारों को पीछे छोड़ा है

और फिर भी जिसके नाख़ून और सींग

नहीं उगे हैं

 

अभी तो बस

रंगीन परदों, तकिए के गिलाफ़ और क्रोशिए की

कढ़ाई का ज़िक्र किया है तूने

मेरे जीवन की लड़ाई और चढ़ाई का ज़िक्र

तो बाक़ी है अभी…

अभी तूने वह कविता लिखनी है, जानेमन…

 

                                                             – अरुणा राय 

                                                       

ख्वाबों का सिगरेट, ख्यालों की व्हिस्की..!

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जिंदगी कभी दोराहे पर खड़ी होती है- कभी चौराहे पर। दिल-दिमाग अलग-अलग रास्तों पर किसी ट्रैफिक पुलिस की तरह नियमों का डंडा दिखाता है। पर मन है जो नहीं मानता बंदिशों को- हालांकि जानता है वो कि अगर हेलमेट न पहनूं तो खतरा मेरे ही ऊपर है- फिर भी। मसला लुत्फ का है- लुत्फ इन बातों में आता है या उन बातों में- ये आप नहीं- आपका दिल तय करता है- या कह सकते हैं आदत- आदत जो आपके अवचेतन मन में पैठ गई है। आप पीछा छुड़ाना चाहते हैं- लेकिन छूट नहीं पातीं- शायद इसलिए इसे आदत कहते हैं- तलब इसका दूसरा नाम है। तलब सिर्फ सुर्ती-सुपारी की नहीं होती- ख्वाबों का सिगरेट और ख्यालों की व्हिस्की भी कम खतरनाक नहीं है। मैं भी इसी का शिकार हूं- निजात पाने की जुगत में लगा हूं- जब कोई नुस्खे की पुड़िया हाथ लगेगी तो बताउंगा आपको भी।

        – आदर्श कुमार इंकलाब     

कभी मिलते हैं ऐसे भी हसीन चेहरे..!

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हर किसी की जिंदगी में ऐसे मौके कई बार आते हैं, जब लगता है कि जिंदगी बेहद खूबसूरत है- किसी हसीन वादियों की तरह। उन लम्हों में जीते हुए हम एक साथ कई जिंदगी जी रहे होते हैं- पुरानी यादों के पुल से गुजरते हुए भविष्य की पगडंडियों तक। वर्तमान से ज्यादा आनंद उस वक्त

भविष्य के गर्भ में छिपा होता है। स्वप्न और यथार्थ का फासला मिटने लगता है। दरअसल यही आनंद है। जब चेतन्य मन-मस्तिष्क हमारा साथ छोड़ दे और हम अकेले अपनी नादानियों के साथ चहलकदमी करें-हम एक बार फिर लौटें अपने बचपन में- फिर शरारत करने को मन मचल उठे- लुत्फ तब आता है। आप भी इंतजार कीजिए- ऐसे मौसम का- बहारें एक बार गुजर चुकी हों तो कोई बात नहीं- बहारे फिर आएंगी। आप फिर मुस्कुराएंगे- झूमेंगे- नाचेंगे- जश्न मनाएंगे- जिंदगी का जश्न।

              

                                          – आदर्श कुमार इंकलाब

उदास है मन आज!

आज न जाने क्यूं जी उदास है। उदासी की कोई खास वजह भी नहीं। आंखें नम हो रही है- दरअसल बुद्ध हो रहा हूं मैं। अपने-पराये सब अब एक-से लगने लगे हैं। लोग कहते हैं- जब मन में पीड़ा हो तो कुछ लिख देना चाहिए- मन हल्का हो जाता है। लेकिन मन में कुछ नहीं है- न सुख- न दुख। बस वक्त-वक्त की बात है- कभी खुशी-कभी गम। मुझे मालूम है जब आप इन शब्दों से गुजर रहे होंगे तो सोचेंगे जरूर कि मायूसी का बयान किसलिए ? हो सकता है एक पंक्ति पढ़कर किसी और अहसास के लिए निकल जाएं। पर क्या करूं ये इस पल का सच है- इस पल खुश नहीं हूं मैं- अभिनय आता है पर कर नहीं सकता- जिंदगी अभिनय नहीं है। हां, एक दुआ जरूर करता रहता हूं कि अपने-पराये सभी खुश रहें- ये जानते हुए भी कि हमारे दुआ कर देने के बाद भी जरूरी नहीं कि दुआ कुबूल हो। खैर, जब-तब मन की बात बांटने को जी चाहता है। विदा लेता हूं आपसे- खुद से- फिर किसी रोज मुलाकात होगी।

                 – आदर्श कुमार इंकलाब