Monthly Archives: अगस्त 2008

निकल पड़े हैं पांव अभागे

कुछ छोटे सपनो के बदले,

बड़ी नींद का सौदा करने,

निकल पडे हैं पांव अभागे, जाने कौन डगर ठहरेंगे !

वही प्यास के अनगढ़ मोती,

वही धूप की सुर्ख कहानी,

वही आंख में घुटकर मरती,

आंसू की खुद्दार जवानी,

हर मोहरे की मूक विवशता, चौसर के खाने क्या जाने

हार जीत तय करती है वे, आज कौन से घर ठहरेंगे .

निकल पडे हैं पांव अभागे, जाने कौन डगर ठहरेंगे !

कुछ पलकों में बंद चांदनी,

कुछ होठों में कैद तराने,

मंजिल के गुमनाम भरोसे,

सपनो के लाचार बहाने,

जिनकी जिद के आगे सूरज, मोरपंख से छाया मांगे,

उन के भी दुर्दम्य इरादे, वीणा के स्वर पर ठहरेंगे .

निकल पडे हैं पांव अभागे, जाने कौन डगर ठहरेंगे…

                                        – डॉ. कुमार विश्वास 

                                   

सच की खोज

कवि अतीत को पढ़ते हैं

प्रेमपत्र की तरह धीरे धीरे और कई बार

युवा पढ़ते हैं

काम संबंधों की बातें किताबों में

पुजारी धर्मग्रंथों को पढ़कर चुनींदा उद्धरण निकालते हैं

फाइलों के ब्योरे दफ्तर के बाबू पढ़ते हैं

बनिये बही को

इतिहासकार शिलालेखों को

सच की खोज में लगे हैं दुनिया के सारे अध्येता

कामना करो वे सफल हों ।

                                  

                  – संगम पांडेय

एहसास

लबों पे लगे हैं पहरे

हैं कुछ दर्द छिपे इन आंखों में,

सिलवटे पड़ गईं माथे पर

यूं दफ्न हैं आहें सांसों में ।

 

बिखरी जुल्फें और सिले होंठ

है अंदर इक भयानक तूफान,

अश्क भी छोड़ चले साथ अब

डूब गए सारे अरमान ।

 

हम तो हैं उन सूखे पत्तों की तरह

जो ढूंढते अपने वजूद हवाओं में,

मंजिलें तो मिलती लहरों को भी

क्यूं घुटन है घुली फिजा़ओं में ।

 

अंधेरी स्याह रात के फलक पे

जैसे इक रोशन चिराग हैं हम,

मकां पे जाते हर इक रास्ते का

सुंदर-सलोना एहसास हैं हम ।

 

और अंत में…

लम्हों के सिरहाने बैठा जब

चूमना चाहा सिंदूरी शाम

घटाओं की काली चादर ने

छीन लिए वो ख्वाब तमाम ।।

                                      

                 – असीम कुमार मिश्रा