Monthly Archives: नवम्बर 2007

डायरी के दो पन्ने!

 

मिर्जा असदुल्लाह खान का एक शेर है-

दोस्ती का पर्दा है बेगानगी

मुंह छिपाना हमसे छोड़ा चाहिए! 

शुक्रवार, सुबह के सात बज रहे थे। उफ्फ..! इस वक्त टेलीकॉलर का फोन!उठाया तो धाराप्रवाह गालियां- शिशुपाल को मात देनेवाली प्रस्तुति। मैंने कितनी बार समझाया उसे कि सुबह-सुबह मार्क्स को मत पढ़ा करो। कहीं वामपंथियों को गाली देने में तुम्हें मजा तो नहीं आता है, निंदा रस का ठर्रा गटकने की आदत तो नहीं पड़ गई तुम्हें। और ये फिर तुम मुझे क्यों सुना रहे हो, जाकर वामपंथियों को सुनाओ। बची-खुची गालियां उसने मेरे लिए रिजर्व रखी थी।

दिल्ली में रहने के बावजूद पिछले दस महीने से मैं उससे मिलने की योजना टालता जा रहा था।  दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर में हमने कई जुलूस साथ-साथ निकाले थे, पुतले फूंके थे और लंबे-चौड़े भाषण दिए थे। केंद्र सरकार हो या कहीं की राज्य सरकार- और फिर चाहे वो किसी भी पार्टी की क्यों ना हो। कुरुक्षेत्र और योजना पढ़ते, आंकड़े जुटाते, एकाध क्रांतिकारी अंतरा लिख डालते- फिर दे दनादन। 

लेकिन आगाज-ए-मुहब्बत का अंजाम वही हुआ, जो होता है। बच्चू फंस गया दर्शन में। जिस दिन उसने अपने महत्वाकांक्षी शोधकार्य के लिए अहंकेंद्रित विषमावस्था पर आधृत युक्ति में तर्कदोषविषय चुना और कमबख्त पैरी(मशहूर दार्शनिक) के चक्कर में पड़ गया, उसी दिन मैंने उसके पिताश्री को फोन घूमा दिया- अंकल, आपको चिंता करने की कोई जरूरत नहीं, आपका सुपुत्र डायनासोर की तरह विलुप्त होते महान विभूतियों की कतार में खड़ा होने में कामयाब हो गया है, दुनिया की तमाम सफलताएं उसके विचारों के सामने तुच्छ है। अंकल भी खुश हो गए कि घर पर जमीन-जायदाद की कमी है नहीं, बेटा महानता की राह पर निकल पड़ा, इससे अधिक सीना फुलाने वाली बात भला फिर क्या होगी? अपने नाम से पहले चार-पांच श्री लगाकर ही दम लेगा। 

यायावरी का दौर याद आया। सोचा कुछ पल के लिए ही सही राहुल सांकृत्यायन वाली जिंदगी जी ली जाए। पहले ही शर्त रख दी मैंने। जुलाई, 2005 के बाद मिल रहे हो, आज क्रांति- व्रांति की बात नहीं करोगे। भागते भूत की लंगोटी ही सही, बेटा मान गया।   मंडी हाउस के श्रीराम सेंटर में कॉफी पीते हुए सुकून तलाशने की कोशिश कर ही रहा था कि देश और दुनिया की बात फिर आ खड़ी हुई। कुत्ते की दुम भी कभी हंड्रेड डिग्री होती है। राम के अस्तित्व पर चल रही राजनीतिक बहस को लेकर टची हो गया। मैंने दो टूक कह दिया- तुम दोहरी मानसिकता के शिकार हो गए हो। चुटकी ली- सन् 1962 से ही कंफ्यूज होने की आदत पड़ी हुई है। तुम वामपंथी होते ही हो ऐसे। एक तरफ तो मार्क्स को पढ़ते हो और दूसरी तरफ राम को लेकर सीरियस हो जाते हो। व्हाट इज ऑल दिस यार! लेकिन सवाल खड़े करने के लिए ही वो पैदा हुआ है। मेरे पत्रकारीय दायित्व पर भी उसने गोले दाग डाले- बारी मेरी थी। भगवान श्रीकृष्ण की तरह मेरे मुस्कुरा देने से वो संतुष्ट नहीं हुआ। एप्पल प्लस इक्वल दबा दी- जूम इन हो गया मैं। मेरी रुह की प्यास है पत्रकारिता। कईयों के लिए ये- बिना कमएले पेट न भरतउ, गुजर जतउ कोना रे- भी हो सकता है, लेकिन मेरा पहला और आखिरी प्यार पत्रकारिता ही है। भारतीय राजनीति बाहरवाली की तरह टाई जरूर खींचती है, लेकिन बेवफा होने की सूरत कतई नजर नहीं आती। मीन-मेख निकालने वाले चाहे जितना सर फोड़े, चंद नकारात्मक पहलुओं के बावजूद अगर टीवी मीडिया इतना लोकप्रिय है तो इसके पीछे इसकी अपनी खूबियां ही है। अगर हम धान की बाली पर ये इल्जाम लगा दें कि इसमें चावल के साथ-साथ भूंसे भी भरे होते हैं तो ये हमारी बेवकूफी ही है। कड़ी प्रतियोगिता है, अधिक से अधिक दर्शकों तक अपनी पहुंच बनाने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, ये हमलोग ही समझ सकते हैं। दही-चूड़ा अगर नहीं बिकता है तो पिज्जा-बर्गर ही सही, अपने ग्राहकों को चलता कर देना कहां की अक्लमंदी है? हम लस्सी भी पिलाते रहते हैं ताकि ग्राहकों का डीलडौल बना रहे। कीड़े की दवा से फायदा तो होता है, लेकिन कड़वी होती है, इसलिए चीनी के साथ गटक लो। सूचना के साथ-साथ मनोरंजन का तड़का। श्रीसंत की तरह घूरने लगा मुझे। तुम श्याम बेनेगल की तरह फिल्में बनाना चाहते हो, मैं यश चोपड़ा की तरह। वीर-जारा की प्रेम कहानी के जरिये अगर शांति का पैगाम दिया जा सकता है तो इसमें हर्ज ही क्या है? तेरी अपनी सोच है, मेरी अपनी सोच। उसने वही कहा जो मेरे तथाकथित बुद्धजीवी मित्र बांचते रहते हैं- तुम बदल गए हो आदर्श!  कोई फर्क नहीं अलबत्ता। 

जबसे मीडिया के माहौल में समर्पित हुआ, उसी समय से सगे-संबंधी, यार-दोस्त सात समंदर पार हो गए। लेकिन उस रोज मैंने तय किया कि जब कभी थोड़ा-सा भी वक्त मिलेगा तो इमली का बूटा-बेरी का पेड़, जरूर गाउंगा। एक छंटाक ही सही, उर्जा की खुराक तो मिल जाती है। रास्ते में अमर्त्य सेन की एक किताब खरीदी, 695 रुपये में- द ऑर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन अभी पहला चैप्टर वॉयस एंड हेट्रोडॉक्सी ही पढ़ पाया हूं। लेकिन बढ़िया किताब है, पढ़ी जानी चाहिए। खा-पीकर लम्बलेट हुआ तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम मेरे मन पर भी छा चुके थे। हृदय-पटल पर राम को लेकर चल रही रस्साकशी का दस्तावेज धीरे-धीरे दर्ज होने लगा।  

काटो तो खून नहीं, फिर उबलेगा कैसे? सवाल आस्था का है, आस्थावादियों की जमात में हमआप हों ना हों हमारा भारतवर्ष तो है। मेरी जन्मभूमि सीतामढ़ी(बिहार) है, जहां जगतजननी मां जानकीजी का जन्म हुआ था। सीतामढ़ी को लोग भगवान राम की अर्धांगिनी सीता के जन्मस्थान के तौर पर ही जानते हैं। मेरी उंगली सेतुसमुद्रम परियोजना पर नहीं, राम के यथार्थ होने ना होने के बहस पर उठी है। निश्चित तौर पर सेतुसमुद्रम परियोजना के अपने लाभ हैं, लेकिन इसके बीच राम की किरकिरी कुरेदकर रख देती है। 

किसी भी एक शख्स का एक वक्तव्य उतना दुखद नहीं है, जितना कि इस बात पर बाकायदा तेल छिड़ककर दियासलाई जला डालना। राम के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह खड़े करना जितना शर्मनाक है, उससे कहीं अधिक शर्मिंदगी की बात है, उसे लेकर राजनीति की रोटियां सेंकना। रोटी की तपन में कमी आ जाए तो फिर से तवे पर चढ़ा देना। जिस तरह से राजनीतिक पार्टियां राम-राम चिल्लाकर अपना काम निकाल रही है, लगता है वो इसे चुनावी मुद्दा बनाकर ही छोड़ेगी। 

सदियों से लोग राम नाम के सहारे जिंदगी जिए जा रहे हैं, जब इंसानों का अपना दुख ही झगड़ने लगता है तो उनके मुंह से यही निकलता है, जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए। 

जब भविष्य की चिंता दर्द का सबब बन जाती है, तो- होइहें वही जो राम रचि राखा- फिर कुछ पलों के लिए बेफिक्री की चादर ओढ़ना आसान हो जाता है। 

टीवी की दुनिया में वो दृश्य हमेशा के लिए ऐतिहासिक बना रहेगा, जब धारावाहिक रामायण के प्रसारण के समय सड़कें सूनी हो जाती थी, सारी हलचलें कुछ पलों के लिए खामोश हो जाती थी, रामायण शुरु होते ही अगरबत्तियां अग्नि का स्पर्श पाकर दमक उठती थीं।  

राम हुए थे या नहीं, इसे गणितीय प्रमेय की तरह सिद्ध नहीं किया जा सकता, इसे लेकर जुबान की दौड़ लगाना या कलम घसीटना फिजूल है। 

हमारे देश के करोड़ों लोगों के विश्वास का दूसरा नाम है राम। 

मानवीय मूल्यों और दायित्व बोध के प्रतीक हैं राम। 

देश की संस्कृति के अटूट अंश हैं राम। 

जिस देश के हजारों स्कूलों में बच्चे प्रार्थना के तौर पर सुंदरकांड का पाठ पढ़ते हैं, कई इलाकों में सुबह हनुमान चालीसा के साथ अंगड़ाई लेती है, वहां के नागरिकों से अगर ये कहा जाए कि तुम जिसकी आराधना में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हो, वो कभी धरा पर अवतरित ही नहीं हुए थे, तो कहीं न कहीं टूटन तो होगी। 

जिनके आराध्य दशरथ के राम नहीं थे, उन्होंने भी अपने राम गढ़ लिए। मसलन कबीरदास, उनके राम निराकार है। उनके राम सामाजिक विद्रूपताओं पर कड़ी चोट करते हैं। लेकिन राम तो विराजमान हैं ही। कुल मिलाकर चंद लोगों के लापरवाही भरे वक्तव्य से आम जनता की भावनाओं को ठेस जरूर पहुंची। 

निंदिया रानी रास्ते में थी, उससे पहले याद आ गईं बचपन में पढ़ी रामचरित मानस की ये पंक्तियां- जासु राज प्रिय प्रजा दुखारीसो नृप अवस मरक अधिकारी। 

   लेकिन यह राम का आदर्श था, करुणानिधि जैसे नेताओं को भला इसकी परवाह क्यूं होगी? 

 

आपका-

 आदर्श कुमार इंकलाब 

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