Monthly Archives: जुलाई 2008

रूस के कवि कुल्यीन कुल्यीयेव की एक कविता

मैं भी जिन दिनों मेरी कच्ची उम्र थी

बेफिक्र गीत गुनगुनाता था बेपरवाह

अंतहीन खुशियों से भरी है ये जिंदगी

नहीं वजह खेद करे और भरें आह

 

यूं ही ताकता था नीले आसमां का नूर

झरनों का पानी पिया मैंने कई बार

पपड़ाई रोटी मेरे स्वाद से थी दूर

ताजा रोटी के लिए नहीं था आभार

 

अब तो मेरे भीतर भी आ गई है समझ बूझ

छूट चुके रास्तों पर लौटता हूं बार-बार

अरे कैसी हो सुबह लेता हूं रोज पूछ

ओ झरने के निर्मल जल तुम्हें मेरा नमस्कार

 

आकाश, हरे खेत और पैड़ी शुभकामना

सुप्रभात ओ खरीदी हुई हमारी पावरोटी

जानता हूं कभी कभी है ये संभावना

कि हो सकती हो तुम दुर्लभ और बहुत सूखी भी

 

मैंने समझबूझ पाई जीकर ये लंबा जीवन

गरिमा से फिर कहता हूं शुभकामना

मेरे विवेक की जगह लेगा जिनका यौवन

उन नौजवानों को जो छुएंगे आसमां

                            – अंग्रेजी से अनुवाद:  संगम पांडेय

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रसूल हमजातोव की कुछ छोटी कविताएं

1.

गांव के एक आदमी की बीवी के

आबनूसी बाल थे

दोनों थे बीस के कि बिछड़ गए

उनकी खुशियों में आए युद्ध के ये साल थे

 

एक नायक के पके हुए बालों वाली विधवा

बैठी हुई रोती है सोचती सिसकती

आज उसका बेटा हुआ है इतना बड़ा

नहीं उसका बाप था जितना कभी भी

2.

 

क्या फायदा उस हीरे या सोने का

जिसे रखा गया हो मिट्टी में गाड़

या उन चमकते सितारों के होने का

जिनके आगे आ गई हो बादलों की आड़

 

दोस्त मैं बात को कहूंगा तनिक मुख्तसर

है ये मेरे लिए बिल्कुल सीधी और स्पष्ट

नहीं जिंदगी के कोई मायने अगर

ठुकराते हो तुम किसी दूसरे के कष्ट

                                         – अंग्रेजी से अनुवाद: संगम पांडेय

 

प्रश्न ?

कल दिन भर कुत्ते की तरह 

पुलिस सड़क पर ऑय,ऑंय करती रही                                  

लोग ज़िंदाबाद मुर्दाबाद करते रहे

डॉक्टर भी बीजी बताए गए

असली ख़बर आज छन के आई

जिधर पुलिस थी उधर दर्जन भर बलात्कार

और कई दर्जन लाशें मिली

कुछ सूखी आँखों में आपका अक्स भी जलता रहा

अब आप ही कहें मुख्यमंत्री महोदय

ये मोदी का गुजरात है

या मार्क्स का बंगाल ?

                                        –कुणाल कुमार