Monthly Archives: अप्रैल 2008

वो बारिश की बूंदें..!

 

 

 पत्तों की गोद में बैठा वो बूंद

टकटकी लगाए आसमां की ओर

न जाने किन ख्यालों में खोया था

पत्तों के सिरहाने पे सिर टिकाए

तारों के बीच कुछ ढूंढ़ रहा था !!!

 

आंखों में नमी और दिल में शायद

कुछ टीस रहा हो

मैंने यूं ही पूछ डाला उससे

आज गुमसुमसे क्यूं हो ?

लड़खड़ाती आवाज में उसने कहा

बादलों ने हवाओं से दोस्ती कर ली है !!!

 

मैंने पूछा क्या फर्क पड़ता है ?

उसने कहा

सूखती जमीं पे मेरा बरसना

तन्हाई की इक रात में

बाहों में सजना

कोई आके भला मुझसे भी पूछे

क्यूं दरख्तों की आड़ में

रह-रहकर सिसकना !!!

 

तबस्सुम की पलकों पे उजली चादर ओढे़

जब आसमां ने ज़मीं से सवाल किया कि

सौंधी खुशबू को किसने जन्म दिया ?

जर्रे-जर्रे से आवाज आई

वो बारिश की बूंदें……!

 

 

– असीम कुमार

देर क्यूं..?

 

 

मेरे प्यारे साथियों..!

ये महज एक ब्लॉग नहीं है, वैचारिक क्रांति का सफर है। इस सफर में हम अकेले नहीं हैं, हमें कदम-कदम पर देश के तमाम युवाओं का प्रेम और सहयोग मिल रहा है। हर महीने ढ़ेर सारी चिट्ठियां, मेल्स और लगभग हर दिन देश के कोने-कोने से आनेवाले अजीजों के फोन- इसी बात का सुबूत है कि इंकलाब हमारे-आपके-सबके दिलों में जिंदा है। जिन सपनों के लिए सुभाषचंद्र बोस, वीर भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव, ठाकुर रोशन सिंह, अशफाकउल्लाह खान जैसे हमारे देश के ना जाने कितने नौजवानों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी, उन सपनों को जिंदा रखना हमारा-आपका-सबका फर्ज है।

तो कलम उठाइए और शामिल हो जाइए वैचारिक क्रांति के इस सफर में।

हमें आपकी रचनाओं का बेसब्री से इंतजार है।

आप किसी भी विषय पर अपने विचार, लेख, कविताएं, गजल, स्केच भेज सकते हैं।

रचनाएं स्वरचित होनी चाहिए। (एक पेज पर लिखित रूप से पूरे पते, फोन नंबर सहित अपना वक्तव्य भेजें कि- यह मेरी मौलिक, अप्रकाशित-अप्रसारित रचना है)

सर्वश्रेष्ठ आलेख, कविता और गजल के रचनाकार को 15 अगस्त के दिन पुरस्कृत किया जाएगा।

सर्वश्रेष्ठ स्केच और चित्र कलाकार के नाम के साथ इस ब्लॉग पर प्रकाशित किए जाएंगे।

विजेताओं का नाम ब्लॉग पर उनकी रचना के साथ प्रकाशित होगा।

जज होंगे मीडिया समीक्षक एवं लेखक डॉ रामप्रकाश द्विवेद्वी, कवयित्रि डॉ चित्रा सिंह और प्रो. अमित कुमार।

रचनाएं भेजने की अंतिम तारीख 15 जून, 2008 है।

नोट- रचनाएं वर्डपैड पर अटैचमेंट के साथ adarsh_272@rediffmail.com पर भेजें।

आपका-

आदर्श कुमार इंकलाब  

जलना किसे कहते है?

 

जलना किसे कहते है?

 

जो जलकर खाक हो चुका हो

या जो जल रहा हो

पल हर पल

 

 जो जल रहा हो

उसके पास अगर ताकत है

तो वो दूसरों को जला सकता है

 

जो जलकर खाक हो चुका हो

उसके पास ये सोचने की फुर्सत ही नहीं है

कि वो दूसरों को भी

उसी आग में झोंक सकता है

जिस आग में वो खुद जल चुका है

या फिर उसे जला दिया है

जालिम जमाने ने जबरन

 

 लेकिन जो जल रहा है

उसे भी अभी तक ये ही नहीं पता है

कि वो खुद जल रहा है

या फिर उसे भी कर दिया गया है

आग के हवाले

धकियाकर

 

जिस दिन सच से उसका सामना होगा

जिस दिन उसे इस बात की खबर होगी

कि दरअसल उसका जलना न जलना

किसी के लिए मायने नहीं रखता

 

और फिर जलना तो हर किसी की नियति है

फर्क इतना है कि उसे अपने जलने का एहसास है

और किसी को पता ही नहीं कि

जलना किसे कहते है?

 

आदर्श कुमार इंकलाब

बारिश की एक बूंद!

 

 

 

क्यूं लगता है डर

नाराज हो जाओगी तुम

मन की बात

चाहकर भी नहीं जता पाता

लबों पर लफ्ज आए

इससे पहले ही दम तोड़ जाते हैं वे

 

तुम्हारे साथ कैसा रिश्ता है

नहीं परिभाषित कर पा रहा

दोस्ती…शायद नहीं

क्यों बेचैन होता मैं

अगर तुम सिर्फ दोस्त होती

 

प्यार…नहीं

ना तुमने कभी इकरार किया ना मैंने

इंतजार रहता है

तुम्हारा नहीं तुम्हारी बातों का

 

सोचता हूं

दिन भर घुमूं तुम्हारे साथ

शाम को किसी बगीचे

या हरियाली के बीच

कुछ पल तुम्हारे साथ बैठकर

करुं कोशिश वो बात कहने की

जो लाख चाहकर भी तुम्हें नहीं कह पाया कभी

या यूं कहे कि कभी

तुम सुनोगी उतने ही गौर से

भरोसा ही नहीं हुआ

मुझे मालूम है कि

बात फिर अनकही रह जाएगी

लेकिन ख्वाबों के बगीचे में

कलियां चुनने का शौक अब भी बुलंद है

 

तुम्हारे हाथों को अपने हाथ में ले लूंगा

कुछ लम्हों के लिए

फिर जुल्फों की पेंचीदगियों को सुलझाउंगा

चेहरे पर हल्की-सी चपत लगाकर

तुम्हारी मुस्कुराहट निहारुंगा

विदा होगी जब तुम

आरजू करुंगा

रुक जाओ बस थोडी देर और

जब जिद पे अड़ जाओगी

भीतर से टूटते हुए

गले लगा लूंगा

माथे को छू पाउंगा मैं

कांपते- थरथराते होठों से

 

सब होगा

या ये सब कुछ नहीं होगा

मेरे कहने पर आओगी किसी दिन

या बहानों के अंबार होंगे तुम्हारे पास

एक तुम्हारी अपनी बनायी

सीमा-लक्ष्मण रेखा होगी

 

या फिर तुम्हारे सपनों का महल

समय से पहले ही बन चुका होगा

 

इस डगर का हर मोड़

मंजिल से अनजान है

समंदर की ख्वाहिश तो दूर

नसीब नहीं होगी

बारिश की एक बूंद!

 

आदर्श कुमार इंकलाब