कथादेश के मीडिया विशेषांक में प्रकाशित मेरा आलेख

हेयर स्टाइलिंग की दुनिया के बेताज बादशाह जावेद हबीब

        हाथ थे मिले कि जुल्फ चांद की संवार दूं- जावेद हबीब के हाथों में कुछ ऐसा ही जादू है। वो हेयर स्टाइलिंग की दुनिया के सबसे रौशन सितारे हैं। यूं तो देश भर में मॉडर्न सैलूनों की भरमार है, लेकिन ऐसे लोग न के बराबर हैं, जो बालों की बारीकियों को बखूबी समझते हों। जब भी हेयर स्टाइलिंग की बात आती है तो सबसे पहला भारतीय नाम जो जुबान पर आता है, वो है- जावेद हबीब। जाने-माने फैशन हेयर स्टाइलिस्ट जावेद हबीब को ये लोकप्रियता यूं हीं नहीं मिली है। यह उनकी लगन और मेहनत का नतीजा है । अपने प्रोफेशन के प्रति जबर्दस्त पैशन से लबरेज जावेद हबीब से मेरी मुलाकात पिछले हफ्ते हुई। उनकी तीन पीढ़ी इस व्यवसाय से जुड़ी रही है। जावेद के दादाजी नाजिर अहमद अपने समय के जाने-माने हेयर स्टाइलिस्ट थे। उनके ग्राहकों की सूची में भारत में ब्रिटिश शासन के अंतिम वायसराय लार्ड माउंटबेटन और आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे व्यक्तित्व शामिल थे । केश-सज्जा में अपना करियर बनानेवाले जावेद जेएनयू से फ्रेंच लिटरेचर में पोस्ट ग्रेजुएट हैं। उन्होंने लंदन के मौरिस स्कूल ऑफ हेयर ड्रेसिंग और लंदन स्कूल ऑफ फैशन से आर्ट एंड साइंस ऑफ हेयर स्टाइलिंग एंड ग्रूमिंग में दो साल का डिप्लोमा किया है। भारत में रंगे हुए बालों को लोकप्रिय बनाने का श्रेय उन्हें ही जाता है। जावेद की शोहरत की वजह से ही सनसिल्क ने उन्हें अपना ब्रांड एंबेसडर चुना। जावेद का नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है- उन्होंने एक दिन में नॉन स्टॉप 410 हेयर कट्स को अंजाम दिए थे। देश भर में जावेद हबीब के करीब 200 सैलून चल रहें हैं, जिसमे लगभग 700 हेयर स्टाइलिस्ट कार्य करते हैं। वो करीब 30 ट्राइकोलॉजी के स्कूल भी चला रहे हैं। भारत के अलावा मलेशिया और नेपाल में भी उनके इंस्टीट्यूट्स हैं। जावेद केश-सज्जा की कला को एक नई उंचाई तक ले जाने में काफी हद तक सफल रहे हैं।

                  जावेद ने मुलाकात के दौरान हेयर स्टाइलिंग से जुड़ी कई खास बाते बताईं। उनका मानना है कि भारतीय अपने बालों को लेकर अभी ज्यादा जागरूक नहीं हुए हैं। लेखकों, पत्रकारों और नेताओं में अपने बालों के प्रति लापरवाह रवैये पर वो कहते हैं- जहां तक हेयर स्टाइलिंग का मामला है, ये दुनिया के अन्य हिस्सों की तुलना में पूरी तरह आउटडेटेड हैं। सबसे जरूरी है सही हेयर कटिंग। जावेद कहते हैं बालों को सही तरीके से काटा जाना पहली आवश्यकता है। इसके साथ ही उसकी सही देख-रेख करनी चाहिए। जावेद का मानना है कि इस ग्लोबल दौर में बालों का मॉडर्न तरीके से देखभाल करना बेहद जरूरी है। उन्होंने मुझसे अपने बालों को खूबसूरत बनाने के लिए कुछ आसान मगर बेहद लाभकारी टिप्स बांटें, जिन्हें आजमाकर आप भी सुंदर बालों के स्वामी बन सकते हैं।

जावेद हबीब के 10 उपयोगी टिप्स-

  1. बालों की सही कटिंग कराएं।
  2. बाल हमेशा साफ रखें।
  3. अच्छे शैंपू से बालों को धोएं।
  4. हेयर डाई का सही तरीके से इस्तेमाल करें वर्ना नुकसान हो सकता है। किसी अच्छे प्रोफेशनल की मदद लें या सही तरीका समझकर खुद भी डाई कर सकते हैं।
  5. मेंहदी एक अच्छा कंडीशनर है- इसे उचित तरीके से प्रयोग में लाएं।
  6. छोटे बालों को मैनेज करना आसान होता है- इसलिए बहुत ज्यादा लंबे बाल की अपेक्षा छोटे बाल रखना ज्यादा फैशनेबल हैं।
  7. आपके चेहरे का आकार चाहे जैसा भी हो, आप अपना मनपसंद स्टाईल अपना सकते हैं। चेहरे के आकार से बालों की डिजाइन पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
  8. हरी सब्जियां और फलों का सेवन ज्यादा करें।
  9. तनाव से दूर रहें, हंसे-मुस्कुराएं।
  10.  अधिक मात्रा में पानी पीएं।

                                 प्रस्तुति : आदर्श कुमार इंकलाब, दिव्या तोमर

शहीद भगत सिंह को नमन!

23 मार्च, 1931 को भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव शहीद हुए थे। आज के दिन उनकी शहादत 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव शहीद हुए थे। आज के दिन उनकी शहादत को जरूर याद किया जाना चाहिए। पर फुर्सत किसे है? कहीं आईपीएल का जलवा है तो कहीं मायावती को पहनाए गए नोटों की माला पर चर्चा-परिचर्चा। हमारा मकसद शहीद भगत सिंह की उपेक्षा की शिकायत करना नहीं है। इंकलाब जिंदाबाद मंच उनकी शहादत को नमन करता है और अपने पाठकों से यह उम्मीद रखता है कि वो भगत सिंह को और ज्यादा जानने और समझने की कोशिश में जुटेंगे। उनके विचार दिलों में जिंदा रहेंगे तो हम सकारात्मक बदलाव की तरफ अग्रसर हो सकेंगे। – इंकलाब जिंदाबाद मंच को जरूर याद किया जाना चाहिए। पर फुर्सत किसे है? कहीं आईपीएल का जलवा है तो कहीं मायावती को पहनाए गए नोटों की माला पर चर्चा-परिचर्चा। हमारा मकसद शहीद भगत सिंह की उपेक्षा की शिकायत करना नहीं है। इंकलाब जिंदाबाद मंच उनकी शहादत को नमन करता है और अपने पाठकों से यह उम्मीद रखता है कि वो भगत सिंह को और ज्यादा जानने और समझने की कोशिश में जुटेंगे। उनके विचार दिलों में जिंदा रहेंगे तो हम सकारात्मक बदलाव की तरफ अग्रसर हो सकेंगे।

                                              – इंकलाब जिंदाबाद मंच

बिहार- लोकसभा चुनाव परिणाम 2009

कांग्रेस

सासाराम-मीरा कुमार

किशनगंज-मोहम्मद असरारूल हक़

जनता दल यूनाइटेड

खगड़िया-दिनेश चंद्र यादव

हाजीपुर- रामसुंदर दास

सीतामढ़ी-अर्जुन राय

झंझारपुर-मंगनी लाल मंडल

मधेपुरा-शरद यादव

मुज़फ़्फ़रपुर- कैप्टन जयनरायण प्रसाद निषाद

गोपालगंज-पूर्णमासी राम

उजियारपुर-अश्वमेध देवी

समस्तीपुर-रामेश्वर हज़ारी

बेगूसराय-मोनाज़िर हसन

मुंगेर-राजीव रंजन सिंह

नालंदा-कौशलेंद्र कुमार

पाटिलपुत्र-रंजन प्रसाद यादव

आरा-मीना सिंह

काराकट-महाबलि सिंह

जहानाबाद-जगदीश शर्मा

औरंगाबाद-सुशील कुमार सिंह

वाल्मिकीनगर-बैद्यानाथ प्रसाद महतो

सुपौल- विश्व मोहन कुमार

जमुई- भूदेव चौधरी

भाजपा-

मधुबनी-हुकुम देवनारायण यादव

अररिया-प्रदीप कुमार सिंह

पूर्णिया-उदय सिंह

गया-हरी मांझी

नवादा-भोला सिंह

पश्चिम चंपारण- डॉक्टर संजय जायसवाल

कटिहार-निखिल कुमार चौधरी

पूर्वी चंपारण-राधामोहन सिंह

दरभंगा-कीर्ति आज़ाद

भागलपुर- शाहनवाज़ हुसैन

पटना साहिब- शत्रुघ्न सिन्हा

शिवहर-रमा देवी

राष्ट्रीय जनता दल-

वैशाली-रघुवंश प्रसाद सिंह

महाराजगंज-उमाशंकर सिंह

सारण-लालू प्रसाद

बक्सर-जगदानंद सिंह

निर्दलीय-

बांका- दिग्विजय सिंह

सीवान-ओमप्रकाश यादव

जरूरत नए नेतृत्व की..!

नहीं मालूम किसे आप सत्ता सौंपेंगे? शायद ये बात आपको भी पता नहीं है कि आप किसके हाथ देश की बागडोर देना चाहते है। आपके पास भी विकल्पों की कमी नहीं है- कमी है तो महज सही फैसले लेने की क्षमता की। आप सवाल उठा सकते हैं कि हर किसी को अपना फैसला सही और दूसरों से बेहतर लगता है-फिर आप कैसे कह सकते हैं कि मेरा फैसला गलत है।

कह सकता हूं मैं। अपने क्षेत्र के लोगों की बात बताता हूं- अगर आप पूछिएगा कि आप किसे वोट देना चाहते हैं- तो भ्रम की स्थिति कायम है- ये भी अपनी ही जाति का है- वो भी अपनी ही जाति का- हम चाहते हैं मनमोहन फिर से प्रधानमंत्री बने- बेचारा अच्छा आदमी है- इसलिए मजबूरी है कि आरजेडी को देना पड़ेगा- हालांकि एमपी ने कोई काम किया ही नहीं है- इधर नीतिश भी अच्छा काम कर रहा है- लेकिन वो बीजेपी के साथ है-कांग्रेस को भी हमलोग वोट दे सकते हैं। जितनी मुंह-उतनी बातें।

जिस एमपी ने पांच साल में अपने क्षेत्र के लोगों का हाल-चाल पूछने की जरूरत तक न समझी, विकास की बात तो दूर- ऐसे एमपी को भी वोट देने के लिए सोच रहे हैं- किसलिए मजबूरी में- क्या होगा अगले पांच सालों में अगर वो जीत भी जाए तो- कोई काम नहीं होगा- जनता फिर अगले चुनाव का टकटकी लगाए इंतजार करेगी- संभव है फिर वही गलती दुहराए।

यहां सन्नी देओल की तारीख पर तारीख वाला डायलॉग याद आता है..चुनाव पर चुनाव…नतीजा ढ़ाक के तीन पात। मेरा कतई मतलब नहीं है कि आप जेडीयू और कांग्रेस को वोट दे..नो…नेभर..! जेडीयू का उम्मीदवार वो व्यक्ति है जिसे आप जानते तक नहीं फिर उस पर भरोसा कैसे कर सकते हैं- और कांग्रेस ने जिस प्रत्याशी को उम्मीदवार बनाया है- उसका कोई अता-पता नहीं चलता- खास समुदाय के वोट पर निगाह है। राम जाने क्या होगा।

मैं बस इतना चाहता हूं कि इन बड़ी पार्टियों द्वारा चुने गए इन अजीबो-गरीब नेताओं के बदले क्यों नहीं आप अपने बीच से किसी व्यक्ति को चुनें-उस पर भरोसा करें- ये फैसला इससे तो बेहतर ही है कि पुराने अकर्मण्य सांसदों को फिर से मजबूरी की माला पहनाएं। इस बार न सोच सके तो 2014 के लिए तैयार रहें। साथ मिलकर कुछ न कुछ करें।
आदर्श बाबू आप बुद्धिजीवी है, दिल्ली में रहते हैं- पत्रकार हैं- आप तो क्षेत्र के लिए समय देने से रहे- आप ही कुछ उपाय सुझाएं- आखिर आपका दायित्व बनता है- जिस मिट्टी से आप आए हैं- हमलोगों को आप पर भरोसा है कि आप कुछ न कुछ करें अपनी जन्मभूमि के लिए। नमस्कार..!

शेखर यादव, सीतामढ़ी।

गजनी: मर्दवादी पीठ और पाठ

ghajinistill01किसी देश का सिनेमा उस देश की सामाजिक-सांस्कृतिक बनावट की पहचान किए ब किना बॉक्स-ऑफिस पर अपनी सफलता दर्ज नहीं कर सकता। गजनी फिल्म ने पहले दो हफ्तों में 200 करोड़ रूपये का व्यापार कर बॉलीवुड में नया इतिहास रचा है।इसकी बॉक्स-ऑफिस की सफलता हमारे समाज के स्वप्न और उसकी कुंठाओं की पहचान में सहायक हो 

सकता है। फिल्म की सफलता का मूल्यांकन सिर्फ इसलिए नहीं किया जाना चाहिए कि उसका प्रोडक्शन खूबसूरत था वरन् इसलिए भी जरूरी हो  जाता है कि वह हमारी किन मनोदशाओं, अभिरुचियों, कुंठाओं,चाहतों,लालसाओं और लिप्साओं को पकड़ने में समर्थ रही है। एक सफल फिल्म वह भी हो सकती है जो हमारी पिछड़ी मानसिकता का प्रतिबिंबन करती हो और हमें प्रगतिशील बनाने के बजाय हमारे जड़ीभूत मूल्यों को संतुष्ट करती हो। कहना चाहिए कि गजनी फिल्म की  सफलता का आधार यही है। इस फिल्म ने हिंदुस्तानी समाज के पितृसत्तात्मक स्वरूप और भाववादी स्वप्न को करीने से अभिव्यक्त किया है। गजनी में मर्दवादी पाठ की निर्मिति के लिए तीन मूल आधार बनाए गए हैं।

1. देह और स्मृति     

2. बदला और

3. पूँजी तथा सत्ता 

आप याद करें कि मध्यकाल में जब राजनीति,धर्मनीति और भूमि पर वर्चस्व के लिए दैहिक बल सर्वाधिक उपयोगी था तब स्त्रियाँ सामाजिक परिदृश्य से गायब हो गयी थीं। देह तो उनके पास थी परंतु वह अनुपयोगी थी। आधुनिक युग में स्त्री की देह एक मूल्यवत्ता अर्जित करती है। वह आकर्षण और अकर्मण्यता के आयाम से बाहर आकर आर्थिक अस्मिता और श्रमजीविता की पहचान अर्जित कर रही है। परंतु हमारी फिल्मों में इस नए संदर्भ को उभारना फिल्म के फ्लाप होने का खतरा मोल लेना है। गजनी में भी स्त्री की देह रागभाव की रचना करती है और पुरुष की देह बदले,आधिपत्य और पूँजी के स्वामित्व को धारण किए हुए रहती है। स्त्री की देह केटेलिस्ट का कार्य करती है और पुरूष की देह की परिचालक भर बन कर रह जाती है।फिल्म की नायिका अपनी भोली अदाओं और रहनुमाई स्वाभाव से नायक(संजय सिंघानिया-आमिर खान) को आकर्षित करती है । उसको अपनी विज्ञापन एजेंसी में भी तभी महत्त्व मिलता है जब उसके संबंध एक पूँजी-पुरुष से जुड़ते हैं। इस जगह पर भी उसके अपने स्वतंत्र अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं। परंतु वह अपने परोपकारी उद्यम को बचाने में खुद शहीद हो जाती है । अब इस शहादत का बदला नायक को लेना होता है और वह इसमें सफल भी होता है।

asinपुरुष वर्चस्व को बड़ी चतुराई से फिल्म में दैहिक स्तर पर स्थापित कर दिया गया है। सवाल उठता है कि दर्शकों ने इस फिल्म के इस दैहिक ट्रीटमेंट को कैसे समझा । स्वाभाविक है कि आज भी हमारे समाज में लड़ने-भिड़ने, कमाने,खर्चने और दोस्ती-दुश्मनी के सभी फैसले पुरुष ही लेता है इसलिए यह फार्मूला हमारे आम दर्शक को पसंद आना था और आया भी। फिल्म में एक शोधार्थी महिला(जिया खान)भी है पर उसका भी काम उत्प्रेरक मात्र का है । बदला लेने में वह नायक की सहायिका बनकर ही उभरती है अपने स्वाधीन व्यक्तित्व के रूप में नहीं।

गजनी में स्मृति के दो रूपों का इस्तेमाल हुआ है। मानव-स्मृति और यांत्रिक-स्मृति दोनों की समानांतर उपस्थिति से फिल्ममें बदले की भावना को बुना गया है। मानव-स्मृति का गुण है कि वह स्वाभाविक रूप से परिष्कृत होती चलती है और अवांछनीय कुंठाओं को कूड़ेदान में डालती चलती है। मनोविश्लेषक सिग्मंड फ्रायड ने मानव मन के अवचेतन भाग को स्मृतियों का कूड़ेदान ही कहा है। इसलिए मानव-स्मृति हार्ड-डिस्क की तरह न होकर एक जैविक प्रक्रिया के तहत काम करती है। फिल्म के शुरुआती भाग में संजय सिंघानिया मानव-समृति का उपयोग करता है जिसमें उसकी आंकाक्षाएँ,स्वप्न,प्रेम और ख्वाहिशें पलती-पनपती हैं।परवर्ती भाग, मानव-स्मृति को मशीनी-स्मृति में तब्दील करने

 का है। नायक की देह कंप्यूटर की हार्ड-डिस्क की तरह उपयोग की जाने लगती है। हर डेटा सुरक्षित रखने का उद्यम शुरू होता है। गजनी धर्मात्मा इस स्मृति को मिटा देना चाहता है। देह का मशीनी कनवर्जन और मशीन को नष्ट कर देने का प्रयत्न फिल्म के दोनों प्रमुख पुरुष पात्र ही करते हैं। डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ के पहलवानों का दृश्य याद कीजिए,मनुष्य नहीं मशीनों की टकराहट प्रतीत होती है वह कुश्ती। संजय सिंघानिया अपनी देह को इसी तरह ढालता है। भारत में अभी महिलाओं की छवि का ऐसा बिंब नहीं बन पाया है,इसलिए स्मृति के मशीनी रूप को महिला नहीं मर्द ही धारण कर सकता था। देह और यांत्रिक-स्मृति मिलकर बदले की भावना का सघनतम निर्माण करने में सक्षम हो जाती हैं जिसे मर्दवादी ढाँचे में ढाले बिना संभव न था।  

बदला गजनी फिल्म का केंद्र है। इसीलिए दर्शकों को इंटरवल के बाद फिल्म अपनी जद में लेती है।यह बदला भी लेने का काम संजय सिंघानिया ही करता है। बदला जिससे लिया जाता है वह भी गजनी धर्मात्मा पुरुष ही है। यानी फिल्म यह दिखाती है कि पुरुषों के खेल में औरतें या तो उपकरण हैं या फिर मर्दवादी क्रीड़ाभूमि के लिए मात्र खिलौना। हमारे समाज में भी स्त्री-पुरुष का यही संबंध कार्यरत रहता है। औरतों की भूमिका अधिकांशत: पुरुष-निर्मित क्रीड़ा भूमि में एक बॉल की तरह होती है जिसे मनचाहे स्थानों पर फेंका जा सकता है। पुरुष,खिलाड़ी की तरह इनका नियंता बन जाता है।  कला का तर्क जागरूक महिलाओं को भी इसकी भनक नहीं लगने देता और वे शायद ही फिल्म के इस अंतर्विरोध को पहचानने में समर्थ हो पाती हैं। गजनी फिल्म में इस सामाजिक सच्चाई को अंतर्विन्यस्त कर दिया गया है और वह दर्शकों को छूने लगती है। बदले की वजह(बॉल) वह बन सकती है, बदला लेने वाली (खिलाड़ी) नहीं।बॉक्स ऑफिस की सफलता की पढ़त बिल्कुल नए नजरिए से करने की जरूरत भी होनी चाहिए। 

          आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण भी हमारे समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों की पहचान का एक महत्त्वपूर्ण कारक है। इस फिल्म में सभी प्रकार की पूँजी पर पुरुषों का ही नियंत्रण दिखाई देता है।पूँजी अर्जित करने और खोने का सारा खेल पुरुषों के बीच ही खेला जाता है। संजय सिंघानिया हो या गजनी धर्मात्मा, पूँजी और सत्ता पर वर्चस्व इन दोनों पुरुषों का ही है।सत्ता और पूँजी की लड़ाई में पुरुष ही शामिल हैं और वे पूरी पटकथा को नियंत्रित करते हैं। फिल्म की खूबी यह है कि संजय सिंघानिया अपनी संवेदनाओं के चलते अपनी पूँजी और व्यवसाय को गौण कर देता है और बदले की भावना को तरजीह देता है,जबकि गजनी धर्मात्मा इन्हें बचाए रखने के लिए संवेदनहीन हो जाता है। आर्थिक संसाधनों का महत्त्व और उनकी निस्सारता दोनों ही फिल्म के भीतर बुनी हुई हैं, पर इन दोनों स्थितियों को उभारने वाले पुरुष-पात्र ही हैं।

यह फिल्म अपनी अंतर्संरचना में हमारे समाज की पितृसत्ता की कई तहों को समाहित किए हुए है। रोजमर्रा की गतिविधियों में यह इतनी रच-पग जाती है कि बिल्कुल स्वाभाविक-सी लगने लगती है। इसी स्वाभाविकता को यह फिल्म पकड़ती है और बॉक्स-ऑफिस पर सफलता अर्जित करती है।कहना न होगा कि गजनी पितृसत्ता को ही पोषित करती है,अपनी सफलता के बावजूद। बल्कि यह कहना अधिक ठीक होगा कि इसका  मर्दवादी पाठ ही इसकी सफलता के केन्द्र में है। 

 

                            –  डॉ राम प्रकाश द्विवेद्वी, सिने समीक्षक

 

अभी तूने वह कविता कहाँ लिखी है, जानेमन..!

 

अभी तूने वह कविता कहाँ लिखी है, जानेमन

मैंने कहाँ पढ़ी है वह कविता

अभी तो तूने मेरी आँखें लिखीं हैं, होंठ लिखे हैं

कंधे लिखे हैं उठान लिए

और मेरी सुरीली आवाज लिखी है

 

पर मेरी रूह फ़ना करते

उस शोर की बाबत कहाँ लिखा कुछ तूने

जो मेरे जिरह-बख़्तर के बावजूद

मुझे अंधेरे बंद कमरे में

एक झूठी तस्सलीबख़्श नींद में ग़र्क रखता है

 

अभी तो बस सुरमयी आँखें लिखीं हैं तूने

उनमें थक्कों में जमते दिन-ब-दिन

जिबह किए जाते मेरे ख़ाबों का रक्त

कहाँ लिखा है तूने

 

 

अभी तो बस तारीफ़ की है

मेरे तुकों की लय पर प्रकट किया है विस्मय

पर वह क्षय कहाँ लिखा है

जो मेरी निग़ाहों से उठती स्वर-लहरियों को

बारहा जज़्ब किए जा रहा है

 

अभी तो बस कमनीयता लिखी है तूने मेरी

नाज़ुकी लिखी है लबों की

वह बाँकपन कहाँ लिखा है तूने

जिसने हज़ारों को पीछे छोड़ा है

और फिर भी जिसके नाख़ून और सींग

नहीं उगे हैं

 

अभी तो बस

रंगीन परदों, तकिए के गिलाफ़ और क्रोशिए की

कढ़ाई का ज़िक्र किया है तूने

मेरे जीवन की लड़ाई और चढ़ाई का ज़िक्र

तो बाक़ी है अभी…

अभी तूने वह कविता लिखनी है, जानेमन…

 

                                                             – अरुणा राय