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कब तक यूं खामोश रहें और सहें हम..?

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भारतवर्ष के सभी नागरिकों को आदर्श कुमार इंकलाब का नमस्कार..!

 

हालात गंभीर हैं। चुनौतियां कठिन हैं। जुबानी दावे अपना अर्थ खो चुके हैं। महज बयान देने का कोई मतलब नहीं है। भारतवर्ष के माथे पर चिंता की लकीरें हैं। कदम उठाने की

बात की जा रही है। कदम उठेगा भी या नहीं- कहना मुश्किल है। हम सभी एक-दूसरे पर

आरोप मढ़ने में लगे हुए हैं। कोई नेता पर उंगली उठा रहा है- कोई जांच एजेंसियों पर।

क्या हुआ- क्यों हुआ- की बजाय अब हमें क्या करना चाहिए- जो करना चाहिए- उसे

किए जाने की जरूरत हैं। हम प्रेम की भाषा बोलनेवाले हैं। अब दूसरी भाषा का इस्तेमाल

करना होगा। अपना घर मजबूत करना होगा। धर्म-जाति-संप्रदाय-प्रदेश- सब कुछ भूलना होगा। समझना होगा कि भारतवर्ष के सभी नागरिक सिर्फ भारतवासी हैं- ना कोई हिंदू- ना कोई मुसलमान- ना कोई सिक्ख- ना कोई ईसाई। ना कोई उत्तर भारतीय- ना कोई

दक्षिण भारतीय। हमारे घर में अपनों के बीच जो खाई है-उसे हर हाल में पाटना होगा।

देशप्रेम का जज्बा हर नागरिक में भरना होगा। भारत के हर युवा-वृद्ध-महिला-बच्चे- सभी

के दिल-ओ-दिमाग में भारतवर्ष जिंदादिली के साथ जिंदा रहना चाहिए। जब हम अपने घर के सभी सदस्यों के साथ- बाहों में बांहें डाले खड़े होंगे- पड़ोसी खुद-ब-खुद सही रास्ते पर आ जाएगा। अगर फिर भी नहीं आएगा तो हिंदुस्तान को समझाना भी तो अच्छी तरह आता है। पहले भी दो बार समझा चुके हैं हम।

 

दूसरी बात देश को नेतृत्व प्रदान करनेवाले लोग कमजोर हो चुके हैं। इसलिए जरूरी है कि युवा आगे आएं। हम हमेशा से कहते आए हैं- आमिर ने भी कहा- देश में एक अच्छे नेतृत्व- युवा नेतृत्व की जरूरत है- आपको भी लगता होगा। आगे बढ़िए- अपनी नई पार्टी खड़ी करना चाहते हों- बेहिचक कीजिए- किसी पार्टी के साथ काम करना चाहते हों- वो भी कीजिए- पर जहां रहिए- जब जरूरत पड़े, ठोस कदम उठाने से पीछे मत हटिए।

कुछ कीजिए- अब देर ठीक नहीं। पूरे भारतवर्ष को इंतजार है। उम्मीद है कि जल्द ही हम अपने देश में अमन-चैन-खुशहाली और प्रेम का माहौल तैयार कर लेंगे। हमें धूल झाड़कर चुनौतियों के लिए तत्काल खड़े होने की जरूरत है। चलिए देखते हैं- आगे क्या होता है। इंकलाब जिंदाबाद का मंच देश के युवाओं के साथ संवाद स्थापित करने के लिए है। उम्मीद है हमारे बीच खूब प्यार बढ़ेगा- देशप्रेम की लहर और मजबूत होगी। हम गर्व से गाते रहेंगे हमेशा- सारे जहां से अच्छा…!

 

इंकलाब जिंदाबाद मंच।

डॉ. रामप्रकाश द्विवेद्वी की कविताएं

एक
तुम्हे देखते हुए
मैं देख पाया
तुम्हारी आँखों में
उमड़ता
नीला सागर अपार।
मैं
देख पाया
तुम्‍हारे होठों पर ठहरे
किसी ऋषि के
हवनकुंड से निकले
तपते लाल अंगार, पवित्र
मैंने देखा
तुम्हारे वक्ष में छिपी
गंगोत्री
प्रवाहित होने को आतुर
देखे मैंने
तुम्‍हारे माथे पर
बीचों बीच फैले
विराट बियाबान
अंधेरों और भय से भरे हुए।
मैं देख पाया
पूर्वजों को
और भावी पीढि़याँ
तुम्‍हारी मुस्‍कान में
पर
नहीं देख पाया कि तुम
कैसे देखती हो पुरुष को।
……………………………………………………..
दो

 

उस रोज
शाम के धुंघलके में
हवाएँ जब पागल हो उठी थीं
अवारा बादलों से लिपट
उतार लायीं थीं उन्‍हें
धरती की नंगी सतह पर।
तब
तुम बिजली-सी कौंध उठी थीं
मेरे खुले आकाश पर।
तुम्‍‍हारी आँखों में बैठा
शैतान झिंझोड़ गया था
मेरे देवता को।
परत दर परत खामोशी
जम गयी थी
मेरे भीतर
कहीं बहुत गहरे।
मेरे फरिश्तों के पंख
तुम्‍हारे जल्लादों की गिरफ्त में
आ गए थे।
फिर
उधर
धरती की देह पर बादल बरसे
इधर तुम
सराबोर सृष्टि
भर उठी अनूठी गंध से।