Monthly Archives: जून 2008

परंपरा,प्रवाह और संस्‍कृति

उस स्‍त्री ने बच्‍ची को नहलाया
कपड़े पहनाए
और फिर
आरती पर
साथ लेकर बैठ गयी उसे।

बच्‍ची ने हाथ जोड़े
प्रसाद खाया

और जैसे-जैसे माँ करती गयी
नकल उतारती रही वह

सुबह शाम
घंटी बजाने की जिद
धूप सुलगाने की ललक
बच्‍ची में

पनपती चली गयी माँ की तरह।
दिन बीते

अब वह बड़ी हो गयी थी
माँ से सोचती थी अलग
कुछ बताती थी
और ज्‍यादा छिपाती थी।

अलग अस्तित्‍व
पहचान की जिद
उसे लगा वह
बिल्‍कुल अलग है माँ से।
माँ की परंपरा
पुरानी सी जान पड़ती थी
मूल्‍य अधूरे

रूढि़यों से घिरी दीखती थी वह
माँ को।
फिर एक दिन वह खुद
बन गयी माँ
उसकी बच्‍ची की आँखों से
झाँक रहे थे अनेक सवाल
शायद उसी के अपने

सवाल।
उसने महसूस किया कि
माँए

हमेशा पुरानी अधूरी और अपर्याप्‍त होती हैं
पर, उनमें प्रवाह थमता नहीं
न रुकती है अपनों के प्रति प्‍यार और अनुरक्ति
माँए होती हैं
परंपरा,प्रवाह और संस्‍कृति।

                      – डॉ. राम प्रकाश द्विवेदी

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जो सींच गए खूं से धरती……!

 

मेरे भारत की आजादी, जिनकी बेमौल निशानी है।

जो सींच गए खूं से धरती, इक उनकी अमर कहानी है।


वो स्वतंत्रता के अग्रदूत, बन दीप सहारा देते थे।

खुद अपने घर को जला-जला, मां को उजियारा देते थे।


उनके शोणित की बूंद-बूंद, इस धरती पर बलिहारी थी।

हर तूफानी ताकत उनके, पौरुष के आगे हारी थी।


मॉ की खातिर लडते-लडते, जब उनकी सांसें सोई थी।

चूमा था फॉंसी का फंदा, तब मृत्यु बिलखकर रोई थी।


ना रोक सके अंग्रेज कभी, आंधी उस वीर जवानी की।

है कौन कलम जो लिख सकती, गाथा उनकी कुर्बानी की।


पर आज सिसकती भारत मां, नेताओं के देखे लक्षण।

जिसकी छाती से दूध पिया, वो उसका तन करते भक्षण।


जब जनता बिलख रही होती, ये चादर ताने सोते हैं।

फिर निकल रात के साए में, ये खूनी खंजर बोते हैं।


अब कौन बचाए फूलों को, गुलशन को माली लूट रहा।

रिश्वत लेते जिसको पकड़ा, वो रिश्वत देकर छूट रहा।


डाकू भी अब लड़कर चुनाव, संसद तक में आ जाते हैं।

हर मर्यादा को छिन्न भिन्न, कुछ मिनटों में कर जाते हैं।


यह राष्ट्र अटल, रवि सा उज्ज्वल, तेजोमय, सारा विश्व कहे।

पर इसको सत्ता के दलाल, तम के हाथों में बेच रहे।


ये भला देश का करते हैं, तो सिर्फ कागजी कामों में।

भूखे पेटों को अन्न नहीं ये सडा रहे गोदामो में।


अपनी काली करतूतों से, बेइज्जत देश कराया है।

मेरे इस प्यारे भारत का, दुनिया में शीश झुकाया है।


पूछो उनसे जाकर क्यों है, हर द्वार-द्वार पर दानवता।

निष्कंटक घूमें हत्यारे, है ज़ार-ज़ार क्यों मानवता।


खुद अपने ही दुष्कर्मों पर, घडियाली आंसू टपकाते।

ये अमर शहीदों को भी अब, संसद में गाली दे जाते।


खा गए देश को लूट-लूट, भर लिया ज़ेब में लोकतंत्र।

इन भ्रष्टाचारी दुष्टों का, है पाप यज्ञ और लूट मंत्र।


गांधी, सुभाष, नेहरू, पटेल, देखो छाई ये वीरानी।

अशफाक, भगत, बिस्मिल तुमको, फिर याद करें हिन्दुस्तानी।


है कहॉं वीर आजाद, और वो खुदीराम सा बलिदानी।

जब लालबहादुर याद करूं, आंखों में भर आता पानी।


जब नमन शहीदों को करता, तब रक्त हिलोरें लेता है।

भारत मां की पीड़ा का स्वर, फिर आज चुनौती देता है।


अब निर्णय बहुत लाजमी है, मत शब्दों में धिक्कारो।

सारे भ्रष्टों को चुन-चुन कर, चौराहों पर चाबुक मारो।


हो अपने हाथों परिवर्तन, तन में शोणित का ज्वार उठे।

विप्लव का फिर हो शंखनाद, अगणित योद्धा ललकार उठें।


मैं खड़ा विश्वगुरु की रज पर, पीड़ा को छंद बनाता हूं।

यह परिवर्तन का क्रांति गीत, मां का चारण बन गाता हूं।

                                                –अरुण मित्तल अद्भुत‘`

महाकाव्य

लड़की
घर से निकलती थी
करने को काम
बस में लड़ती थी
सड़कों पर भी जारी थी उसकी जंग
आफिस में बॉस की निगाहों से जूझती थी
रोज लड़की
मॉं-बाप की चौकस निगरानी
भाई की बहादुरी की कहानी
से लड़ती थी लड़की
अपनी आदिम पनाहगाह में भी
अल्ट्रासाउंड की किरणों से युद्धरत थी लड़की
अकेले

आधुनिक सभ्यता
इस घनघोर वैज्ञानिक तार्किक
और विवेकवान समय में
आफिस से घर तक
सुबह से शाम तक
गर्भ से मृत्‍यु तक
लड़की का जीवन युद्धों से भरा था
लड़की खुद में
एक महाकाव्‍य थी

                          – डॉ. रामप्रकाश द्विवेदी