ख्वाबों का सिगरेट, ख्यालों की व्हिस्की..!

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जिंदगी कभी दोराहे पर खड़ी होती है- कभी चौराहे पर। दिल-दिमाग अलग-अलग रास्तों पर किसी ट्रैफिक पुलिस की तरह नियमों का डंडा दिखाता है। पर मन है जो नहीं मानता बंदिशों को- हालांकि जानता है वो कि अगर हेलमेट न पहनूं तो खतरा मेरे ही ऊपर है- फिर भी। मसला लुत्फ का है- लुत्फ इन बातों में आता है या उन बातों में- ये आप नहीं- आपका दिल तय करता है- या कह सकते हैं आदत- आदत जो आपके अवचेतन मन में पैठ गई है। आप पीछा छुड़ाना चाहते हैं- लेकिन छूट नहीं पातीं- शायद इसलिए इसे आदत कहते हैं- तलब इसका दूसरा नाम है। तलब सिर्फ सुर्ती-सुपारी की नहीं होती- ख्वाबों का सिगरेट और ख्यालों की व्हिस्की भी कम खतरनाक नहीं है। मैं भी इसी का शिकार हूं- निजात पाने की जुगत में लगा हूं- जब कोई नुस्खे की पुड़िया हाथ लगेगी तो बताउंगा आपको भी।

        – आदर्श कुमार इंकलाब     

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कभी मिलते हैं ऐसे भी हसीन चेहरे..!

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हर किसी की जिंदगी में ऐसे मौके कई बार आते हैं, जब लगता है कि जिंदगी बेहद खूबसूरत है- किसी हसीन वादियों की तरह। उन लम्हों में जीते हुए हम एक साथ कई जिंदगी जी रहे होते हैं- पुरानी यादों के पुल से गुजरते हुए भविष्य की पगडंडियों तक। वर्तमान से ज्यादा आनंद उस वक्त

भविष्य के गर्भ में छिपा होता है। स्वप्न और यथार्थ का फासला मिटने लगता है। दरअसल यही आनंद है। जब चेतन्य मन-मस्तिष्क हमारा साथ छोड़ दे और हम अकेले अपनी नादानियों के साथ चहलकदमी करें-हम एक बार फिर लौटें अपने बचपन में- फिर शरारत करने को मन मचल उठे- लुत्फ तब आता है। आप भी इंतजार कीजिए- ऐसे मौसम का- बहारें एक बार गुजर चुकी हों तो कोई बात नहीं- बहारे फिर आएंगी। आप फिर मुस्कुराएंगे- झूमेंगे- नाचेंगे- जश्न मनाएंगे- जिंदगी का जश्न।

              

                                          – आदर्श कुमार इंकलाब

उदास है मन आज!

आज न जाने क्यूं जी उदास है। उदासी की कोई खास वजह भी नहीं। आंखें नम हो रही है- दरअसल बुद्ध हो रहा हूं मैं। अपने-पराये सब अब एक-से लगने लगे हैं। लोग कहते हैं- जब मन में पीड़ा हो तो कुछ लिख देना चाहिए- मन हल्का हो जाता है। लेकिन मन में कुछ नहीं है- न सुख- न दुख। बस वक्त-वक्त की बात है- कभी खुशी-कभी गम। मुझे मालूम है जब आप इन शब्दों से गुजर रहे होंगे तो सोचेंगे जरूर कि मायूसी का बयान किसलिए ? हो सकता है एक पंक्ति पढ़कर किसी और अहसास के लिए निकल जाएं। पर क्या करूं ये इस पल का सच है- इस पल खुश नहीं हूं मैं- अभिनय आता है पर कर नहीं सकता- जिंदगी अभिनय नहीं है। हां, एक दुआ जरूर करता रहता हूं कि अपने-पराये सभी खुश रहें- ये जानते हुए भी कि हमारे दुआ कर देने के बाद भी जरूरी नहीं कि दुआ कुबूल हो। खैर, जब-तब मन की बात बांटने को जी चाहता है। विदा लेता हूं आपसे- खुद से- फिर किसी रोज मुलाकात होगी।

                 – आदर्श कुमार इंकलाब

कब तक यूं खामोश रहें और सहें हम..?

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भारतवर्ष के सभी नागरिकों को आदर्श कुमार इंकलाब का नमस्कार..!

 

हालात गंभीर हैं। चुनौतियां कठिन हैं। जुबानी दावे अपना अर्थ खो चुके हैं। महज बयान देने का कोई मतलब नहीं है। भारतवर्ष के माथे पर चिंता की लकीरें हैं। कदम उठाने की

बात की जा रही है। कदम उठेगा भी या नहीं- कहना मुश्किल है। हम सभी एक-दूसरे पर

आरोप मढ़ने में लगे हुए हैं। कोई नेता पर उंगली उठा रहा है- कोई जांच एजेंसियों पर।

क्या हुआ- क्यों हुआ- की बजाय अब हमें क्या करना चाहिए- जो करना चाहिए- उसे

किए जाने की जरूरत हैं। हम प्रेम की भाषा बोलनेवाले हैं। अब दूसरी भाषा का इस्तेमाल

करना होगा। अपना घर मजबूत करना होगा। धर्म-जाति-संप्रदाय-प्रदेश- सब कुछ भूलना होगा। समझना होगा कि भारतवर्ष के सभी नागरिक सिर्फ भारतवासी हैं- ना कोई हिंदू- ना कोई मुसलमान- ना कोई सिक्ख- ना कोई ईसाई। ना कोई उत्तर भारतीय- ना कोई

दक्षिण भारतीय। हमारे घर में अपनों के बीच जो खाई है-उसे हर हाल में पाटना होगा।

देशप्रेम का जज्बा हर नागरिक में भरना होगा। भारत के हर युवा-वृद्ध-महिला-बच्चे- सभी

के दिल-ओ-दिमाग में भारतवर्ष जिंदादिली के साथ जिंदा रहना चाहिए। जब हम अपने घर के सभी सदस्यों के साथ- बाहों में बांहें डाले खड़े होंगे- पड़ोसी खुद-ब-खुद सही रास्ते पर आ जाएगा। अगर फिर भी नहीं आएगा तो हिंदुस्तान को समझाना भी तो अच्छी तरह आता है। पहले भी दो बार समझा चुके हैं हम।

 

दूसरी बात देश को नेतृत्व प्रदान करनेवाले लोग कमजोर हो चुके हैं। इसलिए जरूरी है कि युवा आगे आएं। हम हमेशा से कहते आए हैं- आमिर ने भी कहा- देश में एक अच्छे नेतृत्व- युवा नेतृत्व की जरूरत है- आपको भी लगता होगा। आगे बढ़िए- अपनी नई पार्टी खड़ी करना चाहते हों- बेहिचक कीजिए- किसी पार्टी के साथ काम करना चाहते हों- वो भी कीजिए- पर जहां रहिए- जब जरूरत पड़े, ठोस कदम उठाने से पीछे मत हटिए।

कुछ कीजिए- अब देर ठीक नहीं। पूरे भारतवर्ष को इंतजार है। उम्मीद है कि जल्द ही हम अपने देश में अमन-चैन-खुशहाली और प्रेम का माहौल तैयार कर लेंगे। हमें धूल झाड़कर चुनौतियों के लिए तत्काल खड़े होने की जरूरत है। चलिए देखते हैं- आगे क्या होता है। इंकलाब जिंदाबाद का मंच देश के युवाओं के साथ संवाद स्थापित करने के लिए है। उम्मीद है हमारे बीच खूब प्यार बढ़ेगा- देशप्रेम की लहर और मजबूत होगी। हम गर्व से गाते रहेंगे हमेशा- सारे जहां से अच्छा…!

 

इंकलाब जिंदाबाद मंच।

डॉ. रामप्रकाश द्विवेद्वी की कविताएं

एक
तुम्हे देखते हुए
मैं देख पाया
तुम्हारी आँखों में
उमड़ता
नीला सागर अपार।
मैं
देख पाया
तुम्‍हारे होठों पर ठहरे
किसी ऋषि के
हवनकुंड से निकले
तपते लाल अंगार, पवित्र
मैंने देखा
तुम्हारे वक्ष में छिपी
गंगोत्री
प्रवाहित होने को आतुर
देखे मैंने
तुम्‍हारे माथे पर
बीचों बीच फैले
विराट बियाबान
अंधेरों और भय से भरे हुए।
मैं देख पाया
पूर्वजों को
और भावी पीढि़याँ
तुम्‍हारी मुस्‍कान में
पर
नहीं देख पाया कि तुम
कैसे देखती हो पुरुष को।
……………………………………………………..
दो

 

उस रोज
शाम के धुंघलके में
हवाएँ जब पागल हो उठी थीं
अवारा बादलों से लिपट
उतार लायीं थीं उन्‍हें
धरती की नंगी सतह पर।
तब
तुम बिजली-सी कौंध उठी थीं
मेरे खुले आकाश पर।
तुम्‍‍हारी आँखों में बैठा
शैतान झिंझोड़ गया था
मेरे देवता को।
परत दर परत खामोशी
जम गयी थी
मेरे भीतर
कहीं बहुत गहरे।
मेरे फरिश्तों के पंख
तुम्‍हारे जल्लादों की गिरफ्त में
आ गए थे।
फिर
उधर
धरती की देह पर बादल बरसे
इधर तुम
सराबोर सृष्टि
भर उठी अनूठी गंध से।

आंखों की चौखट में विश्वास की अल्पना…काशी..!

मैंने कल इक सपना देखा…देखा…देखा…सपना देखा!

कभी-कभी। कभी-कभी या यूं कहें कि अक्सर जिंदगी में ऐसे पल आते हैं जब आपको सकारात्मक बने रहने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। आप जिंदगी के ताने-बाने में यूं उलझते हैं कि जिंदगी ही खो जाती है। कुछ समझ नहीं आता कि आखिर करें क्या? व्यावसायिक काम-काज निपटाकर जब फुर्सत के दो पल नसीब होते हैं तो मन सुकून के लिए तड़प उठता है- लेकिन सुकून कहां मिलेगा- पता ही नहीं चलता। फिर हम भटकने लगते हैं- पहले मन भटकता है फिर हम। और भटकते-भटकते कभी नींद आ जाती है तो कभी नींद के इंतजार में ही रात को अलविदा कहना पड़ता है। और अगले रोज हम फिर व्यावसायिक सफर पर निकल पड़ते हैं।

हम लाख रोकें सवाल तो फूट ही पड़ता है कि मन आखिर इतने बेचैन क्यों हो? चाहते क्या हो आखिर?सपने तुमसे या तुम सपनों से कहीं भाग तो नहीं रहे? या फिर तुम्हारा आत्मविश्वास डगमगा रहा है कि तुम कभी उन सपनों के लायक ही नहीं थे। हम जानते हैं हमें जवाब नहीं मिलेगा- क्योंकि जवाब तो हम ही देंगे ना- जो हम देना नहीं चाहते। अजीब पहेली है। हम क्यों ऐसे सवाल उठाते हैं- जिसका जवाब हम खुद ही नहीं जानना चाहते हैं। या साफ कहें कि- डर लगता है। हां- डर तो लगता है- सवाल से भी और जवाब से भी। और इस मामले में विकल्पहीन नहीं है दुनिया- पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है।

क्या करेंगे आप?  चाय पीएंगे आप- एक कप- दो कप-तीन कप- जितना चाहे पीजिए- कोई फर्क नहीं पड़ेगा। सिगरेट पीएंगे- रिस्क लेंगे- सेहत से क्यों खिलवाड़ कर रहें हैं- हमें जवाब चाहिए- जवाब तो सिगरेट पीने से भी नहीं मिलेगा- अलबत्ता जिंदगी में बेवजह एक सवाल और जोड़ लेंगे। सिगरेट के कश में भी वो बात नहीं रही। सब फिजूल है। भ्रम है। धुएं की धरोहर है।

बीयर पीएंगे- पीकर देखते हैं- कुछ नहीं मिलेगा- बेचैनी और बढ़ जाएगी सुकून…आ जा रे- सुकून आपके पुकारे नहीं आएगा। शराब- गटकते हैं तो जिस्म जलता है- रूह भी- फिर क्यों पिए जा रहें है- खुद नहीं पी, दोस्तों ने पिला दी- थोड़ी पी- फिर सुकून तलाशिएगा- फिर सुकून की याद भी जाती रहेगी-अगली सुबह जब उठेंगे तो हेडेक रहेगा- फिर काली चाय-लाल चाय- अगला दिन फिर बर्बाद- अगले दिन सुकून की चाह और बढ़ जाएगी।

बैठ जाइए- बैठ नहीं सकते। सो जाइए- नींद नहीं आती।

क्यूं कर रहें है सुकून का इंतजार- सुकून अगर आ गई तो आप मर जाएंगे- आपका अस्तित्व चिल्लाकर फिर दम तोड़ देगा। मत कीजिए- इंतजार- न सुकून का न ही किसी ऐसी चीज का जो आपके वश में नहीं है। मुश्किल है..पनघट की डगर है..चलना पड़ेगा..नहीं तो पानी हलक तक कैसे उतरेगी। जिंदगी है आपकी या फिल्म…इसकी तो कहानी ही उलझी है…फिर कैमरा लिए कहां जा रहें है…क्या कैद करेंगे कुछ पता भी है…अरे मोबाइल तो लेते जाइए…कोई इंपॉर्टेंट कॉल आ गई तो…बैट्री तो चार्ज है ना…एटीएम से पैसा निकाल लिया है आपने…जाइए जो मन में आए शूट कीजिए- फिर एडिट टेबल पे ठीक कीजिएगा…क्या बनाइएगा तीसरी कसम….दुनिया बनानेवाले क्या तेरे मन में समाई….उसने दुनिया बनाई…आप फिल्म बनाइए…बॉक्स ऑफिस पर चलनी चाहिए- याद रखिए…मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता- कुछ लेना-देना नहीं है- आर्ट हो या कमर्शियल या क्या कहते हैं उसे…समानांतर सिनेमा।

खैर बनाइए चाहे जो भी पहले कैमरा लेकर निकलिए तो सही कि दिमाग से ही बैठे-बैठे पिक्चर शूट कीजिएगा। चलता हूं…कहां…पता नही…लेकिन पिक्चर बनानी है दोस्त…क्योंकि जिंदगी की पिक्चर अभी शूट नहीं हुई है…जिंदगी की पिक्चर तो अभी पूरी बाकी है।

                         

                                -आदर्श कुमार इंकलाब

( अपने सपने से ही साभार- आखिर ये जमा पूंजी मेरी नहीं मेरे सपनों की है)