Category Archives: मेरी कविताएं

चिंगारी

एक चिंगारी जल रही है

भीतर

उसकी लौ

कभी तेज होती है

कभी सोच-विचार के फेर में

पड़कर

धीमी पड़ जाती है

लेकिन

जब हवाओं का रुख बदलता है

मौसम अंगड़ाई लेती है

बादल मचल उठता है

बारिश डूबो देती है

तन-मन को शांति के सागर में

ऐसे माहौल में भी

हम टटोलते हैं दियासलाई

और सर्द पड़ चुके लाल बूंदों के ऊपर

दौड़ा देते हैं

निराशा के सभी भावों को

फिर जल उठती है छोटी- सी चिंगारी

वही चिंगारी

जिसे हम

अपने मासूम बच्चे की तरह

कलेजे से लगाए

भटकते फिरते हैं

दुलारते हैं उसे

पुचकारते हैं बार-बार

समझाते हैं कि

तुम्हारे होने से ही

काबिज है हमारा अस्तित्व

 

भले ही दुनिया बदली है

और इस तरह बदली है

कि किसी के लिए

मुमकिन नहीं रह गया है

किसी को पूरे भरोसे के साथ

अपना कहना

गले लगा लेना

फिर हाथ में हाथ लिए

कहना

कि भाई इतने दिनों तक कहां थे?

आप तो बिल्कुल भूल ही गए

अच्छा हुआ आज आप मिल गए

बहुत दिन हो गए थे बात किए हुए।

 

एक ऐसे दौर में

जब निश्चल हंसी

ढ़ूंढने से नहीं मिलती

कलि-काल के कालचक्र में

मजाक का पात्र

बना दिए जाने के खतरे के बावजूद

तुम्हें खिलखिलाते हुए देखना चाहता हूं

वादा करता हूं

चाहे जितनी लपटें उठें

तुम्हें जलाने के लिए

पर मैं तुम्हें जिलाए रखूंगा

हर हाल में

और तुम हर भंवर से बच निकलोगे

रहोगे बेखौफ

हमारे संग

भक्त प्रहलाद की तरह !

                            – आदर्श कुमार इंकलाब

अधूरी लगती है…

जहां तो कहता है कि

सूर्य की लालिमा का सौंदर्य

अनुपम है, अद्भुत है

तो फिर मैं क्यूं

उसके सामने होने पर भी

सिर्फ तुम्हारे ही ख्यालों में खोया रहता हूं.?

 

कवियों की कलम से भी

यही स्वर फूटे कि

चांद का दीदार करो

तो मन मचल उठता है

अतुलनीय है

नयन-मन उन्मादिनी

चंद्रमा की चांदनी

झूठ…सफेद झूठ

सिर्फ तुम्हारी याद ही है

जो मुकम्मल है

रूह को मदहोशी के आगोश में

अमृत-कलश पिलाने के लिए.!

 

बहकते हुए बादलों से घिरी

मतवाली काली घटाओं को

गौर से कभी निहारा है ?

सच कहता हूं आदर्श

पागल हो जाओगे.!

लेकिन मैं क्या करूं

उस दिलकश फिजां में भी

दिल उसी दिलरूबा को

पुकारता है

कि आओ

और छिपा लो इस दीवाने को

अपने आंचल में

लगा दो अपने होठों से

मुहर, मेरे माथे पर

और सत्यापित कर दो

कि पूरी दुनिया में

हमारा प्रेम

सबसे सुंदर हैं।

 

कायनात के कमल को

जन्म देनेवाले

परमपिता परमेश्वर

भगवान ब्रह्मा के चरण-स्पर्श कर

मैंने प्रार्थना की

हे ईश्वर ! मुझे माफ करना, पर

तुम्हारे द्वारा रची गई

सृष्टि की हर रचना

अधूरी लगती है

यहां तक कि मैं

और मेरी कविता भी

महज मेरे महबूब के सिवा..!

            

                              – आदर्श कुमार इंकलाब

पूंजीवाद

 

 

 

बंदरवाला

हाथ नचा-नचाकर

बजाए जा रहा था डमरू

डिग-डिग, डम-डम

उछलता-कूदता, पीछे-पीछे

बच्चों का मस्तमौला झुंड !

 

दिखी अट्टालिका सामने

डाल दी पोटली

लगा जोर-जोर से बजाने

डिम-डिम डमरू

गाने लगा साथ-साथ

नाच मेरी बुलबुल..!

 

होने लगी

चवन्नी-अठन्नी की

पतझड़-सी बारिश

हनुमान जी समझकर

खिलाने लगे लोग बंदर को

केले-रोटी

 

भांति-भांति के करतब

दिखाए जा रहा था बंदर

बढ़ने लगी भीड़ धीरे-धीरे

एक क्षण के लिए रुका बंदर

पतली छड़ी पड़ी उस पर

सटाक…..!

 

बेचारे बंदर ने दृष्टि डाली

पहले अपने मालिक पर

फिर सिक्कों पर

नम हो गईं उसकी आंखें

शायद समझ गया था वह

पूंजीवाद का अर्थ..!

 

आदर्श कुमार इंकलाब

जलना किसे कहते है?

 

जलना किसे कहते है?

 

जो जलकर खाक हो चुका हो

या जो जल रहा हो

पल हर पल

 

 जो जल रहा हो

उसके पास अगर ताकत है

तो वो दूसरों को जला सकता है

 

जो जलकर खाक हो चुका हो

उसके पास ये सोचने की फुर्सत ही नहीं है

कि वो दूसरों को भी

उसी आग में झोंक सकता है

जिस आग में वो खुद जल चुका है

या फिर उसे जला दिया है

जालिम जमाने ने जबरन

 

 लेकिन जो जल रहा है

उसे भी अभी तक ये ही नहीं पता है

कि वो खुद जल रहा है

या फिर उसे भी कर दिया गया है

आग के हवाले

धकियाकर

 

जिस दिन सच से उसका सामना होगा

जिस दिन उसे इस बात की खबर होगी

कि दरअसल उसका जलना न जलना

किसी के लिए मायने नहीं रखता

 

और फिर जलना तो हर किसी की नियति है

फर्क इतना है कि उसे अपने जलने का एहसास है

और किसी को पता ही नहीं कि

जलना किसे कहते है?

 

आदर्श कुमार इंकलाब

बारिश की एक बूंद!

 

 

 

क्यूं लगता है डर

नाराज हो जाओगी तुम

मन की बात

चाहकर भी नहीं जता पाता

लबों पर लफ्ज आए

इससे पहले ही दम तोड़ जाते हैं वे

 

तुम्हारे साथ कैसा रिश्ता है

नहीं परिभाषित कर पा रहा

दोस्ती…शायद नहीं

क्यों बेचैन होता मैं

अगर तुम सिर्फ दोस्त होती

 

प्यार…नहीं

ना तुमने कभी इकरार किया ना मैंने

इंतजार रहता है

तुम्हारा नहीं तुम्हारी बातों का

 

सोचता हूं

दिन भर घुमूं तुम्हारे साथ

शाम को किसी बगीचे

या हरियाली के बीच

कुछ पल तुम्हारे साथ बैठकर

करुं कोशिश वो बात कहने की

जो लाख चाहकर भी तुम्हें नहीं कह पाया कभी

या यूं कहे कि कभी

तुम सुनोगी उतने ही गौर से

भरोसा ही नहीं हुआ

मुझे मालूम है कि

बात फिर अनकही रह जाएगी

लेकिन ख्वाबों के बगीचे में

कलियां चुनने का शौक अब भी बुलंद है

 

तुम्हारे हाथों को अपने हाथ में ले लूंगा

कुछ लम्हों के लिए

फिर जुल्फों की पेंचीदगियों को सुलझाउंगा

चेहरे पर हल्की-सी चपत लगाकर

तुम्हारी मुस्कुराहट निहारुंगा

विदा होगी जब तुम

आरजू करुंगा

रुक जाओ बस थोडी देर और

जब जिद पे अड़ जाओगी

भीतर से टूटते हुए

गले लगा लूंगा

माथे को छू पाउंगा मैं

कांपते- थरथराते होठों से

 

सब होगा

या ये सब कुछ नहीं होगा

मेरे कहने पर आओगी किसी दिन

या बहानों के अंबार होंगे तुम्हारे पास

एक तुम्हारी अपनी बनायी

सीमा-लक्ष्मण रेखा होगी

 

या फिर तुम्हारे सपनों का महल

समय से पहले ही बन चुका होगा

 

इस डगर का हर मोड़

मंजिल से अनजान है

समंदर की ख्वाहिश तो दूर

नसीब नहीं होगी

बारिश की एक बूंद!

 

आदर्श कुमार इंकलाब

न्याय

कई बार चाहा मैंने कि

भावनाओं की अभिव्यक्ति के साथ

कर सकूं न्याय

असफल रहा मैं..! 

 

कोयल की कूक

यंत्रों से नहीं निकलती

संवेदना की धारा

रोशनाई से नहीं फूटती।

 

कलम और कागज

बस सहचर बनकर

दुख-सुख बांट लेते हैं।

 

हर बार

बहुत कुछ

रह जाती है शेष

पीड़ा और बेचैनी

जख्मों को हरा रखने के लिए..!

आदर्श कुमार इंकलाब

 

 

आवाज

आधी रात को

पलकों का चमकना

जांबाज धड़कनों का

धड़-धड़-धड़-धड़ धड़कना

हृदय में स्वप्नों की कुलबुलाहट

किसी के  ना आने की आहट

चांद के बदन को टूटकर

प्यार करने की अकुलाहट-छटपटाहट

आदर्श और यथार्थ के बीच

दिन-ब-दिन बढ़ती टकराहट

बर्दाश्त नहीं कर पाता हूं

बिखेर देता हूं कागज पर

रोशनी की जगमगाहट

जुनून की तपिश व

प्रियतम की कशिश को..!

                                                                                                                                                             

घने कुहरे को चीरकर

दमकता हुआ सूरज

जो असंभव है, उसका आकर्षण

त्याग और भोग का घर्षण

कर्म और भाग्य का प्रदर्शन

समंदर की लहरों की भांति

गर्जन करता मेरा आत्मविश्वास

हर क्षण विजेता बनूंगा मैं

गूंजेंगी फिजा में

बस… मेरी ही आवाज..!

आदर्श कुमार इंकलाब