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हम गणतंत्र भारत के परतंत्र नागरिक…

दस्तकें दें-दें थकेगा एक दिन यह इंकलाब,
गर जलालत इस तरह सहते रहेंगे आदमी।
 तागड़ धिना…तागड़ धिना ता…ता…ता..!26 जनवरी के दिन सोचता हूं कि जिंदगी का छब्बीसवां पैकेज बाइट पर नहीं एंबियंस पर काटूं।भले ही पत्थर-सी मांसपेशियां नहीं हैं, ना ही लोहे-से अभय भुजदंड हैं लेकिन नस-नस में आग की लहर तो है( यानी दिनकर की कंचनी कसौटी पर खरा उतरता हूं)। उस आग-अलाव के साथ-साथ सपने जगते रहते हैं, जलते रहते हैं। मैं भारतवर्ष के 54 करोड़ युवाओं में शामिल एक आम युवा हूं(आम इसलिए कि सोनिया गांधी की तरह मुझे हर महीने में पचास हजार चिट्ठियां नहीं आतीं), जिसे इस बात का पक्का और पूरा भरोसा है कि जिन्हें लोग किताबी और ख्याली बातें कहते हैं, उन्हें भी साक्षात किया जा सकता है। चाहे दुनिया अपने पके बालों का लाख हवाला देते फिरे । बकौल अंका-
राह-राह में कदम-कदम पर, दफ्तर या दुकानों में-
लोग सयाने दीवानों को कुछ से कुछ समझाते हैं। 
मैं उन लोगों की फेहरिस्त में नहीं शामिल होना चाहता, जो तमाम उम्र हालात को कोसते और दूसरों को दोष देते फिरते हैं या फिर किनारे बैठकर तमाशाई बने रहते हैं, दूसरे शब्दों में बुद्धिजीवी बन जाते हैं, व्यावहारिक होने का गर्व महसूस कर मुस्कान बिखेरते हैं। देश के करोड़ों लोगों की तरह मेरी भी कमजोरियां हैं, सीमाएं हैं, मुंह मोड़ने के लिए तमाम वजहें भी हैं। फिर भी छोटी-छोटी चीजें करना चाहता हूं, अपने वतन के लिए, बिना बताए, चुपचाप।यथा शक्ति, तथा भक्ति।
अंधेरे पर क्यूं झल्लाएं,
अच्छा हो एक दीप जलाएं।  
करीब ढ़ाई हजार साल पहले कवि संत तिरुवल्लुवर की लिखी पंक्तियां मुझे बचपन में पढ़ने को मिलीं, जिसका अर्थ बाद में काफी पूछताछ के बाद पता चला-
वेल्लथ थनैया मलारनीतम मानधर्थम उल्लथ थनैया थुयारवू।(यानी नदी या झील या ताल की गहराई, जल की स्थिति चाहे जो भी हो, लिली फूल हमेशा बाहर निकलता है)या किसी कवि की शब्दों में यूं कहें कि-
क्या पतझर के बाद वसंत का आगमन नहीं होगा? अवश्य होगा..! 
 मार्क्स के मुताबिक- जो जैसा जीवन जीता है, उसकी चेतना वैसी होती चली जाती है। बचपन भले ही स्वामी विवेकानंद, नेताजी सुभाष, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, इकबाल और मार्क्स को पढ़ते हुए गुजरा हो, लेकिन कड़वा सच यही है कि उन लोगों की तरह देश को कुछ दे जाने का माद्दा मुझमें नहीं है। साथ ही जिंदगी दुनिया की खुरदरी सच्चाईयों के साथ गुजरी हैं, इसके बावजूद इतना समझदार नहीं हो पाया कि उनकी बातों को कागद की लेखी मानकर भूल जाऊं और समझदारों की बिरादरी में शामिल हो जाऊं। या खो जाउं उन लोगों की भीड़ में, जो बातें तो बहुत बनाते हैं और उनसे होता कुछ नहीं है।  आप माने या ना माने, लेकिन असलियत यही है कि सपने शिथिल नहीं हुए हैं।  शायद इसलिए आपसे संवाद की जरूरत है।
विज्ञान का छात्र होने के कारण समझता हूं कि भौतिकी में यदि दो फ्रीक्वेंसी मैच करती है तो अनुनाद होता है।  
अपनी बातें लोगों के सामने रखे जाने पर बुद्धिविलास का इल्जाम मढ़े जाने का खतरा तो है पर-
कहना तो वही है जो मेरी लहू में है,
चाहे आप कुछ भी कहें हमारे बयान पर।
हम तो ऐसे हैं भइया। 
अपने देशवासियों की तरह मैं भी गणतंत्र दिवस का जश्न तहे दिल से मनाता हूं, लेकिन ना चाहते हुए भी विचारों का जंप कट लग ही जाता है। आजादी के परवानों के लिए आजादी का मतलब महज अंग्रेजों से मुक्ति नहीं था। उनका संकल्प था- समाज की जड़ों में पैठी उन बुराईयों को निकाल फेंकना, जिनकी वजह से हमारे वतन की हंसी-खुशी पर खतरा पैदा होता है। टीस की बात ये रही कि 15 अगस्त सन् 1947 को हमने मान लिया कि हम पूरी तरह आजाद हो गए। पर हकीकत यही है कि हम अब भी गणतंत्र भारत के परतंत्र नागरिक हैं। निचली अदालत में भगतसिंह ने क्रांति का मतलब बखूबी समझाया था।
क्रांति के लिए खूनी लड़ाईयां जरूरी नहीं है और न ही इसमें व्यक्तिगत हिंसा के लिए कोई जगह है। वह बम और पिस्तौल का संप्रदाय भी नहीं है। क्रांति के मायने हैं- अन्याय और भ्रष्टाचार पर आधारित समाज में आमूल परिवर्तन। 
बदलाव की जरूरत से किसी को इंकार नहीं हो सकता लेकिन पहल भी तो हमें ही करनी होगी।
कंचनजंघा की चमकती चोटी को देखना हो तो दार्जिलिंग जाना ही पड़ेगा।
 जिन महानुभावों को हमने देश का पथ प्रदर्शक या जनवादी भाषा में नेता बनाकर देश की जिम्मेदारी सौंप दी, उनकी चर्चा करना किसी बहरे के सामने झुनझुने बजाना यानी समय बर्बाद करना भर है। वर्षों पहले सुनील दत्त से दिल्ली में मुलाकात के समय मैंने जब उनसे देश की राजनीति में युवाओं को भरपूर मौका दिए जाने की बात कही थी और आंकड़े के साथ-साथ दो-चार इंकलाबी सवाल दागे थे तो वो बस मुस्कुराकर रह गए। इस मसले पर देश के अधिकांश कर्णधारों की भंगिमा यही होती है। वो दलील देते फिरते हैं कि युवा इस काबिल हैं ही नहीं। यहां बरबस मुझे हरिकिशोर चतुर्वेदी की पंक्तियां याद आती हैं- 
क्या आप भी उसी व्यवस्था के अंग हैं
जिनके इशारों पर जुगनुओं को ही
घोषित कर दिया गया है प्रकाश पुंजऔर
सूरज को अधेरों में गुम कर दिया गया है? 
कब्र में पैर लटकाए तख्त पर बैठ चुके बुजुर्ग और खास लोगों ने देश के लिए कुछ भी खास किया हो, मुझे तो ऐसा नहीं लगता। आम लोगों ने ज्योहीं उन्हें सिर आंखों पर बिठाया(जिस तरह फ्रेम बनाते समय कैमरा का हेडरूम काटकर हम किसी का सिर ऊंचा कर देते हैं, गलती यहीं हुई) वो खास हो गए और आम लोगों के लिए उनमें नफरत की भावना पैदा हो गई। मुझे याद है- सुभाष घई को जब भारत के सिनेप्रेमियों ने राजकपूर के बाद दूसरा शो मैन घोषित कर दिया तो सन् 2001 में यादें फिल्म के रिलीज के मौके पर घई ने बयान दिया कि मैंने ये फिल्म पटना और भोपाल के रिक्शा खींचनेवालों के लिए नहीं बनाई है…(देशी आंखों से विदेशी सपने)। ये सुभाष घई का दंभ और अहंकार बोल रहा था। नतीजा सामने है। हालांकि उस वक्त महेश भट्ट ने कहा था कि- सुभाष घई नाम का ब्रांड मर रहा है और उसे जिंदा करने के लिए उन्हें चमत्कार करना होगा। खैर..!  मेरे पैरों में घुंघरू बंधा दे तो फिर मेरी चाल देख ले। उदारीकरण के रास्ते खुलने के बाद तरक्की के अलावा और भी बहुत कुछ समझ में आ रहा है। बाजार का अपना मिजाज है। एक अच्छे और संवेदनशील अभिनेता होने के बावजूद शाहरुख खान को सिक्स पैक एब्स बनाने की जरूरत पड़ती है और दुनिया से मुखातिब होकर कहना पड़ता है कि– दिस मेक्स मी फील लाइक ए स्टार। ये समझ में भी आता है, पर जब 25 साल तक समाजवाद की सीख देते हुए राज्य की सत्ता का स्वाद चखनेवाले ज्योति बसु के दिमाग का पेंच अब अचानक दुरुस्त होता है(तकनीकी भाषा में यूं कहें कि जब उनके दिमाग का मॉनीटर कैलिब्रेटेड हो जाता है) तो फरमाते हैं कि समाजवाद अब सपना है और पूंजीवाद समय की जरूरत है। सच पूछिए तो मुझे हिंदी फिल्मों के रंग बदलते सारे खलनायक एक-एक कर याद आने लगते हैं। फिर मार्क्स के नुमाइंदे का मुलम्मा किसलिए? ये हैं माकपा के भारत रत्न। बड़-बड़ गेलन, बैजू अयलन। ऊपर से जनता की नब्ज को समझने का दंभ भरते हैं। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने 26 जनवरी, 1930 को जारी किए गए अपने घोषणा-पत्र में सशस्त्र क्रांति का विरोध किए जाने पर गांधीजी की ओर संकेत करते हुआ कहा था कि- कोई व्यक्ति जनसाधारण की विचारधारा को केवल मंचों से दर्शन और उपदेश देकर नहीं समझ सकता। वह तो केवल इतना ही दावा कर सकता है कि तरह-तरह के विषयों पर उसने अपनी बातें जनता के सामने रखीं। जनसमर्थन का दर्परखनेवाले बुद्धदेव भट्टाचार्य और ज्योति बसु को ज्यादा फुदकने से परहेज रखना चाहिए।  
26 जनवरी के मौके पर इस पल मुझे अपना शहर याद आ रहा है, जहां लोग मुझे आदर्श कम इंकलाब नाम से ज्यादा जानते हैं। कोई- कोई मजाक में क्रांति कुमार भी कह डालता है। जितनी मुंह, उतनी बातें।
दरअसल आदर्श से आदर्श कुमार इंकलाब होने की भी अपनी कहानी है।छठी कक्षा का छात्र था, जब मैंने पहला जुलूस निकाला था। उस समय सीतामढ़ी के जिलाधिकारी सुधीर कुमार थे। मामला छोटा था और जोश जबरदस्त। दंडस्वरूप एक शिक्षक का तबादला काफी दूर कर दिया गया था, कलाकार थे वे, इसलिए हमें आगे आना पड़ा था। इसके अलावा स्कूल में सुविधाएं बढ़ाने के लिए भी दबाव डाला जाना था।मेरे पीछे-पीछे करीब डेढ़ सौ विद्यार्थी थे, नारे की गूंज में हमारी मांगें शामिल थीं।मेरा एक दोस्त था- इंदल, बुलंद आवाज का मालिक। मेरे मना करने के बावजूद हर चार-पांच नारे के बाद-एक तरफ से आदर्श कुमार……..तो दूसरी तरफ से जोर से आवाज आती- इंकलाब..!ऐसा वो मस्ती के मूड में कर रहा था, लेकिन ये गूंज रूह का संगीत बन गई। इस तरह आदर्श कुमार के साथ इंकलाब का रिश्ता हमेशा-हमेशा के लिए जुड़ गया।  
(गरीबों का लहू
जो पसीना बनकर बहता है
ठंडी आह
जो फिजां में फैल जाती है
आकस्मिक मौत
जो अभाव में हो जाती है
सब हैं- मौन शहादत
जो विचारों की उर्जा देती है
अनुभूति का ताप बनती है
ज्वालामुखी विस्फोट बनकर
जड़ता की जमीन तोड़ती है
इंकलाब आता है।)
 ये अलग बात है कि ये रिश्ता जब मुझ पर हंसता है तो सिर खुद-ब-खुद जमीन का दीदार करने लगता है। खैर, हमारी मांगे मानी गईं। अगले दिन क्षेत्रीय अखबार की पहली हेडलाइन हमारे जुलूस की खबर बनी।    आज किडनी के व्यापार वाली खबर देखने के बाद मन खुद-ब-खुद ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाने लगा। भगत सिंह का लेख- मैं नास्तिक क्यों हूं?– की पंक्तियां भीतर घुमड़ने लगीं। फिर ट्रांजिशन प्लेट के साथ ख्यालों में गालिब आ धमके। 
महरम नहीं है तू ही नवाहाए- राज का,
या वरना जो हिजाब है, पर्दा है साज का! 
 ( मेरे हिसाब से ये शेर हकीकी शेर है- ऐ गालिब ये तेरा कुसूर है कि तू अल्लाह की हकीकत को नहीं पहचानता। वरना, उस ईश्वर के होने का सुबूत संसार की एक-एक चीज से जाहिर होता है। काश तुझमें भी इतनी समझ होती कि तू भी सच्चाई को पहचान सकता। तेरी मिसाल उस अनजान आदमी की तरह है, जो यह नहीं जानता कि सितार के तार से आवाज कैसे निकाली जाती है, पर एक जानकार उसके एक-एक तार से सैकड़ों आवाजें निकाल लेता है, जो उसमें छिपी हुई है।) फिर अपनी ताकत का एहसास होता है- 
इंतजार की हद हो चुकी।
घुट-घुट कर जीते हुए दशकों बीत गए।
बदलाव की उम्मीद थी पर मिला तो सिर्फ धोखा।
आखिर कब तक छले जाते रहेंगे?
और कितना बर्दाश्त करेंगे?
दुनिया के भंवरजाल में आखिर कब तक फंसे रहेंगे?
नित-नई चुनौतियों से कब तक आंखे चुराए रहेंगे?
वक्त आवाज दे रहा है…नई क्रांति की नई राहें बाहें फैलाए इंतजार कर रही हैं।
तो आइए जागरूक बनें और नेताओं को बता दें कि-
हम महज एक वोट नहीं तुम्हारे भाग्य-विधाता हैं।
और तुम ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियां नहीं मना सकते! 
 क्रांति चिरंजीवी हो, जय हिंद, इंकलाब…जिंदाबाद! 
गणतंत्र दिवस की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं!  
 आपका-

आदर्श कुमार इंकलाब

     

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डायरी के दो पन्ने!

 

मिर्जा असदुल्लाह खान का एक शेर है-

दोस्ती का पर्दा है बेगानगी

मुंह छिपाना हमसे छोड़ा चाहिए! 

शुक्रवार, सुबह के सात बज रहे थे। उफ्फ..! इस वक्त टेलीकॉलर का फोन!उठाया तो धाराप्रवाह गालियां- शिशुपाल को मात देनेवाली प्रस्तुति। मैंने कितनी बार समझाया उसे कि सुबह-सुबह मार्क्स को मत पढ़ा करो। कहीं वामपंथियों को गाली देने में तुम्हें मजा तो नहीं आता है, निंदा रस का ठर्रा गटकने की आदत तो नहीं पड़ गई तुम्हें। और ये फिर तुम मुझे क्यों सुना रहे हो, जाकर वामपंथियों को सुनाओ। बची-खुची गालियां उसने मेरे लिए रिजर्व रखी थी।

दिल्ली में रहने के बावजूद पिछले दस महीने से मैं उससे मिलने की योजना टालता जा रहा था।  दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर में हमने कई जुलूस साथ-साथ निकाले थे, पुतले फूंके थे और लंबे-चौड़े भाषण दिए थे। केंद्र सरकार हो या कहीं की राज्य सरकार- और फिर चाहे वो किसी भी पार्टी की क्यों ना हो। कुरुक्षेत्र और योजना पढ़ते, आंकड़े जुटाते, एकाध क्रांतिकारी अंतरा लिख डालते- फिर दे दनादन। 

लेकिन आगाज-ए-मुहब्बत का अंजाम वही हुआ, जो होता है। बच्चू फंस गया दर्शन में। जिस दिन उसने अपने महत्वाकांक्षी शोधकार्य के लिए अहंकेंद्रित विषमावस्था पर आधृत युक्ति में तर्कदोषविषय चुना और कमबख्त पैरी(मशहूर दार्शनिक) के चक्कर में पड़ गया, उसी दिन मैंने उसके पिताश्री को फोन घूमा दिया- अंकल, आपको चिंता करने की कोई जरूरत नहीं, आपका सुपुत्र डायनासोर की तरह विलुप्त होते महान विभूतियों की कतार में खड़ा होने में कामयाब हो गया है, दुनिया की तमाम सफलताएं उसके विचारों के सामने तुच्छ है। अंकल भी खुश हो गए कि घर पर जमीन-जायदाद की कमी है नहीं, बेटा महानता की राह पर निकल पड़ा, इससे अधिक सीना फुलाने वाली बात भला फिर क्या होगी? अपने नाम से पहले चार-पांच श्री लगाकर ही दम लेगा। 

यायावरी का दौर याद आया। सोचा कुछ पल के लिए ही सही राहुल सांकृत्यायन वाली जिंदगी जी ली जाए। पहले ही शर्त रख दी मैंने। जुलाई, 2005 के बाद मिल रहे हो, आज क्रांति- व्रांति की बात नहीं करोगे। भागते भूत की लंगोटी ही सही, बेटा मान गया।   मंडी हाउस के श्रीराम सेंटर में कॉफी पीते हुए सुकून तलाशने की कोशिश कर ही रहा था कि देश और दुनिया की बात फिर आ खड़ी हुई। कुत्ते की दुम भी कभी हंड्रेड डिग्री होती है। राम के अस्तित्व पर चल रही राजनीतिक बहस को लेकर टची हो गया। मैंने दो टूक कह दिया- तुम दोहरी मानसिकता के शिकार हो गए हो। चुटकी ली- सन् 1962 से ही कंफ्यूज होने की आदत पड़ी हुई है। तुम वामपंथी होते ही हो ऐसे। एक तरफ तो मार्क्स को पढ़ते हो और दूसरी तरफ राम को लेकर सीरियस हो जाते हो। व्हाट इज ऑल दिस यार! लेकिन सवाल खड़े करने के लिए ही वो पैदा हुआ है। मेरे पत्रकारीय दायित्व पर भी उसने गोले दाग डाले- बारी मेरी थी। भगवान श्रीकृष्ण की तरह मेरे मुस्कुरा देने से वो संतुष्ट नहीं हुआ। एप्पल प्लस इक्वल दबा दी- जूम इन हो गया मैं। मेरी रुह की प्यास है पत्रकारिता। कईयों के लिए ये- बिना कमएले पेट न भरतउ, गुजर जतउ कोना रे- भी हो सकता है, लेकिन मेरा पहला और आखिरी प्यार पत्रकारिता ही है। भारतीय राजनीति बाहरवाली की तरह टाई जरूर खींचती है, लेकिन बेवफा होने की सूरत कतई नजर नहीं आती। मीन-मेख निकालने वाले चाहे जितना सर फोड़े, चंद नकारात्मक पहलुओं के बावजूद अगर टीवी मीडिया इतना लोकप्रिय है तो इसके पीछे इसकी अपनी खूबियां ही है। अगर हम धान की बाली पर ये इल्जाम लगा दें कि इसमें चावल के साथ-साथ भूंसे भी भरे होते हैं तो ये हमारी बेवकूफी ही है। कड़ी प्रतियोगिता है, अधिक से अधिक दर्शकों तक अपनी पहुंच बनाने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, ये हमलोग ही समझ सकते हैं। दही-चूड़ा अगर नहीं बिकता है तो पिज्जा-बर्गर ही सही, अपने ग्राहकों को चलता कर देना कहां की अक्लमंदी है? हम लस्सी भी पिलाते रहते हैं ताकि ग्राहकों का डीलडौल बना रहे। कीड़े की दवा से फायदा तो होता है, लेकिन कड़वी होती है, इसलिए चीनी के साथ गटक लो। सूचना के साथ-साथ मनोरंजन का तड़का। श्रीसंत की तरह घूरने लगा मुझे। तुम श्याम बेनेगल की तरह फिल्में बनाना चाहते हो, मैं यश चोपड़ा की तरह। वीर-जारा की प्रेम कहानी के जरिये अगर शांति का पैगाम दिया जा सकता है तो इसमें हर्ज ही क्या है? तेरी अपनी सोच है, मेरी अपनी सोच। उसने वही कहा जो मेरे तथाकथित बुद्धजीवी मित्र बांचते रहते हैं- तुम बदल गए हो आदर्श!  कोई फर्क नहीं अलबत्ता। 

जबसे मीडिया के माहौल में समर्पित हुआ, उसी समय से सगे-संबंधी, यार-दोस्त सात समंदर पार हो गए। लेकिन उस रोज मैंने तय किया कि जब कभी थोड़ा-सा भी वक्त मिलेगा तो इमली का बूटा-बेरी का पेड़, जरूर गाउंगा। एक छंटाक ही सही, उर्जा की खुराक तो मिल जाती है। रास्ते में अमर्त्य सेन की एक किताब खरीदी, 695 रुपये में- द ऑर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन अभी पहला चैप्टर वॉयस एंड हेट्रोडॉक्सी ही पढ़ पाया हूं। लेकिन बढ़िया किताब है, पढ़ी जानी चाहिए। खा-पीकर लम्बलेट हुआ तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम मेरे मन पर भी छा चुके थे। हृदय-पटल पर राम को लेकर चल रही रस्साकशी का दस्तावेज धीरे-धीरे दर्ज होने लगा।  

काटो तो खून नहीं, फिर उबलेगा कैसे? सवाल आस्था का है, आस्थावादियों की जमात में हमआप हों ना हों हमारा भारतवर्ष तो है। मेरी जन्मभूमि सीतामढ़ी(बिहार) है, जहां जगतजननी मां जानकीजी का जन्म हुआ था। सीतामढ़ी को लोग भगवान राम की अर्धांगिनी सीता के जन्मस्थान के तौर पर ही जानते हैं। मेरी उंगली सेतुसमुद्रम परियोजना पर नहीं, राम के यथार्थ होने ना होने के बहस पर उठी है। निश्चित तौर पर सेतुसमुद्रम परियोजना के अपने लाभ हैं, लेकिन इसके बीच राम की किरकिरी कुरेदकर रख देती है। 

किसी भी एक शख्स का एक वक्तव्य उतना दुखद नहीं है, जितना कि इस बात पर बाकायदा तेल छिड़ककर दियासलाई जला डालना। राम के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह खड़े करना जितना शर्मनाक है, उससे कहीं अधिक शर्मिंदगी की बात है, उसे लेकर राजनीति की रोटियां सेंकना। रोटी की तपन में कमी आ जाए तो फिर से तवे पर चढ़ा देना। जिस तरह से राजनीतिक पार्टियां राम-राम चिल्लाकर अपना काम निकाल रही है, लगता है वो इसे चुनावी मुद्दा बनाकर ही छोड़ेगी। 

सदियों से लोग राम नाम के सहारे जिंदगी जिए जा रहे हैं, जब इंसानों का अपना दुख ही झगड़ने लगता है तो उनके मुंह से यही निकलता है, जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए। 

जब भविष्य की चिंता दर्द का सबब बन जाती है, तो- होइहें वही जो राम रचि राखा- फिर कुछ पलों के लिए बेफिक्री की चादर ओढ़ना आसान हो जाता है। 

टीवी की दुनिया में वो दृश्य हमेशा के लिए ऐतिहासिक बना रहेगा, जब धारावाहिक रामायण के प्रसारण के समय सड़कें सूनी हो जाती थी, सारी हलचलें कुछ पलों के लिए खामोश हो जाती थी, रामायण शुरु होते ही अगरबत्तियां अग्नि का स्पर्श पाकर दमक उठती थीं।  

राम हुए थे या नहीं, इसे गणितीय प्रमेय की तरह सिद्ध नहीं किया जा सकता, इसे लेकर जुबान की दौड़ लगाना या कलम घसीटना फिजूल है। 

हमारे देश के करोड़ों लोगों के विश्वास का दूसरा नाम है राम। 

मानवीय मूल्यों और दायित्व बोध के प्रतीक हैं राम। 

देश की संस्कृति के अटूट अंश हैं राम। 

जिस देश के हजारों स्कूलों में बच्चे प्रार्थना के तौर पर सुंदरकांड का पाठ पढ़ते हैं, कई इलाकों में सुबह हनुमान चालीसा के साथ अंगड़ाई लेती है, वहां के नागरिकों से अगर ये कहा जाए कि तुम जिसकी आराधना में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हो, वो कभी धरा पर अवतरित ही नहीं हुए थे, तो कहीं न कहीं टूटन तो होगी। 

जिनके आराध्य दशरथ के राम नहीं थे, उन्होंने भी अपने राम गढ़ लिए। मसलन कबीरदास, उनके राम निराकार है। उनके राम सामाजिक विद्रूपताओं पर कड़ी चोट करते हैं। लेकिन राम तो विराजमान हैं ही। कुल मिलाकर चंद लोगों के लापरवाही भरे वक्तव्य से आम जनता की भावनाओं को ठेस जरूर पहुंची। 

निंदिया रानी रास्ते में थी, उससे पहले याद आ गईं बचपन में पढ़ी रामचरित मानस की ये पंक्तियां- जासु राज प्रिय प्रजा दुखारीसो नृप अवस मरक अधिकारी। 

   लेकिन यह राम का आदर्श था, करुणानिधि जैसे नेताओं को भला इसकी परवाह क्यूं होगी? 

 

आपका-

 आदर्श कुमार इंकलाब 

आजादी की साठवीं सालगिरह मुबारक हो!

 

क्या यही सब सोच कर वो देश पर कुरबां हुए

क्या इसी दिन के लिए चढते रहे वो सूलियां

क्या यही जन्नत है जिसको देखने के वास्ते

फूंक डाले थे उन्होंने खुद ही अपने आशियां..!

जिंदगी के 25 पतझड़-सावन-बसंत-बहार बीत चुके हैं, या यूं कहें कि मैंने अपनी उम्र की रजत जयंती मना ली है। ये पच्चीसवां पंद्रह अगस्त है, जो मेरी जिंदगी में आया है। इस पंद्रह अगस्त का कभी मुझे बेसब्री से इंतजार रहता था।

बात सन् 1987 की है, पांच साल का मासूम था। पहली अगस्त से ही मेरे स्कूल में पंद्रह अगस्त की तैयारियां शुरु हो जाती थीं। तब मैं भी देशभक्ति गीतों के रियाज और क्रांतिकारी नारे लगाने में मशगूल हो जाता, एकिक नियम जाए तेल बेचने। मैं अपने स्कूल में सबसे ज्यादा जोर से इंकलाब-जिंदाबाद के नारे लगाता था। वक्त बीतते गए, इसकी गूंज रूह में समाती चली गई।

 

पारिवारिक माहौल राजनीतिक था, धीरे-धीरे देश की दिशा-दशा समझने लगा था। उन दिनों राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, उनके बारे में एक चुटकुला उन दिनों बेहद लोकप्रिय हुआ था। राजीव गांधी किसी सब्जी की दुकान पर गए, दुकान पर हरी और लाल दोनों तरह की मिर्च के ढे़र थे। राजीव गांधी ने दोनों तरह की मिर्च की कीमत पूछी, जब उन्हें मालूम हुआ कि लाल मिर्च ज्यादा महंगी है तो उन्होंने कहा कि लोग फिर लाल मिर्च ही क्यों नहीं उगाते, ताकि उन्हें ज्यादा कीमत हासिल हो। मामला परवरिश का था। 

 

हमारे देश की परवरिश भी इन 60 सालों में जिसके जिम्मे थी, वो कितना भला कर पाए, इसका जवाब अगर ढूंढना हो तो गांवों में घूम आइए, बिना सवाल पूछे आपको खुद-ब-खुद जवाब मिल जाएगा। साथ ही आप लौटेंगे एक और सवाल के साथ कि हमें क्या मिला

 

जवाहर लाल नेहरु, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे करिश्माई छवि वाले प्रधानमंत्रियों ने इस देश के लिए अपने माथे पर कितने बल लिए, इसे कंचनी कसौटी पर कसने के लिए किताबों और पत्र-पत्रिकाओं के संदर्भों की बजाय हकीकत की जमीन तलाशने की ज्यादा जरूरत है। 

 

1929 में लाहौर में रावी नदी के तट पर हुए कांग्रेस अधिवेशन में जब गांधी जी ने पंडित जवाहर लाल नेहरु को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया था, उसी समय से गांधी जी नेहरु की नेतृत्व क्षमता में विश्वास करने लगे थे। हालांकि नेहरु जी 1919 से ही चर्चा में आ गए थे, जब वो अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव पद पर नियुक्त हुए थे। कालांतर में प्रेस की आजादी के पक्षधर नेहरु ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया और ग्लिम्पसेज ऑफ द वर्ल्ड हिस्ट्री जैसी किताबें लिखकर अपनी कलम का भी लोहा मनवा लिया। इसमें कोई शक नहीं कि उन्होंने राजनीतिक आदर्शवाद की नींव रखी, हमारे स्वाभिमान को आवाज दी, लेकिन उतना ही कड़वा सच ये भी है कि वो जमीनी विकास की बजाए विचारों की भूल-भूलैया में भटकते रहे। बाद में चलकर उनकी सुपुत्री इंदिरा गांधी ने ही उनके स्थापित किए हुए राजनीतिक मूल्यों की तिलांजलि दे दी। वैज्ञानिकता और व्यवहारिकता की कसौटी पर नेहरु के उन सिद्धांतों को इंदिरा जी ने परखा और अपनी सूझ-बूझ का इस्तेमाल करते हुए कुछ हद तक स्थितियों को बदलने की कोशिश की। गरीबी कितनी दूर हुई, ये अलग बात है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि गांवो के लोगों के लिए वो एक महान और मजबूत नेता थीं। लोकप्रियता की राजनीति की शुरुआत का श्रेय उन्हें ही जाता है। 20 सूत्रीय कार्यक्रम से हालात कुछ बदले। इसके साथ ही उन्होंने राष्ट्रहित में कई बड़े और कड़े फैसले लिए। लाल बहादुर शास्त्री के बाद वो आम जनता के बीच सबसे पसंदीदा प्रधानमंत्री बनीं। शहर के लोग भले ही उन्हें तानाशाही और निरंकुशता के लिए कोसे। उनके दामन पर भी कई छींटें पड़ी, इसके बावजूद बी के बरुआ ने जब कहा- इंदिरा इज इंडिया तो एतराज जताने वालों की जमात उठ खड़ी हुई। वाजिब भी था। 

 

 

राजीव गांधी की आलोचना के लिए बहुत वाकये पेश किए जा सकते हैं, लेकिन तकनीकी रुप से उन्होंने भारत को बेहद समृद्ध किया। विज्ञान और तकनीक में उनकी दिलचस्पी ने हमारे राष्ट्र को तरक्की के लिए एक ठोस बुनियाद दी।

 

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब 1987 में राजीव गांधी और उनके परिवार वालों पर बोफोर्स मामले में आरोप लगाना शुरु किया, तब वो अचानक चर्चा में आए और जब अगस्त, 1990 में प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशों पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी, तब वो पिछड़े वर्गों के लिए मसीहा बनकर उभरे। उनके इस योगदान के लिए पिछड़ी और अनुसूचित जातियां-जनजातियां हमेशा याद रखेगी। उन दिनों उनकी लोकप्रियता मुर्गा छाप पटाखे की तरह बम बम थी। वी पी सिंह ने मंडल के जरिये अपने आभामंडल का खूब विस्तार किया। फिर ठीक तीन महीने बाद आडवाणी जी ने भी हाथों में कमंडल लिया और चल पड़े राम रथ लेकर, लालू यादव ने जब बिहार में उनके रथ का चक्का पंक्चर किया तो आडवाणी ने वी पी सिंह से समर्थन खींच लिया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। मंडल का जादू चल निकला, उसका फायदा वी पी सिंह को भले ही ना हुआ हो लेकिन क्षेत्रीय नेताओं ने मंडल के नाम पर खूब मलाई काटी। वी पी सिंह मंडल के अलावा कुछ खास नहीं कर पाए, लेकिन एक संवेदनशील कवि और कलाप्रेमी प्रधानमंत्री के रुप में उनके लिए लोगों के मन में सम्मान तो है ही।  

 

अटल बिहारी वाजपेयी मुझे हमेशा एक दिग्भ्रमित नेता लगे…गीत नया गाता हूं…गीत नहीं गाता हूं….उन पर टीका-टिप्पणी करना मैं वक्त की बर्बादी समझता हूं। सिर्फ एक बात के लिए थोड़ी दाद देना चाहूंगा कि 1977 में जब वो जनता पार्टी की सरकार में विदेश मंत्री के पद पर सुशोभित थे, उसी दरम्यान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने अपनी मातृभाषा हिंदी में भाषण दिया था। हिंदी के माथे पर चंद लम्हों के लिए बिंदी की चमक बिखेर दी।

  

मनमोहन सिंह को मैं करिश्माई छवि का प्रधानमंत्री नहीं मानता, उन्हें नॉन प्राइम मिनिस्टर कहने वालों की भी कमी नहीं है। मुझे उनकी काबिलियत और उनकी योजनाओं पर कतई संदेह नहीं हैं लेकिन उनके कार्यों का विश्लेषण अभी करना जल्दबाजी होगी। भारत में आर्थिक सुधारों की नींव डालनेवाले के तौर पर उन्हें याद किया जा सकता है। कांग्रेस ने आजाद भारत में सबसे अधिक करीब साढ़े चार दशकों तक राज किया। आजादी के छह दशक बीत चुके हैं, जो लोग उनके हर कदम पर हमदम थे, उन्हें भी अब ये बात समझ आ गई है कि कांग्रेस पार्टी ने उनके बाल उल्टे छुरे से मुंड़ लिए हैं।

 

 

 हर घर से एक रुपया और एक ईंट मांगकर अयोध्या में राम मंदिर बनाने का दावा करने वाली भाजपा ने झल्लाकर मई, 2003 में कह दिया- काशी और मथुरा उसके एजेंडे में नहीं है। सन् 1992 में धर्म के नाम पर लोगों के दिलों में आग लगाने की कोशिश हुई, इंसान को संप्रदाय के आधार पर मरोड़ने का खेल खुलकर खेला गया। मकसद सिर्फ एक था-वोट की राजनीति। एनरॉन बिजली परियोजना पर चीख-पुकार मचानेवाली भाजपा जब 13 दिनों के लिए सत्ता में आई तो उसने ही उसे मंजूरी दी। 2004 में तमाम अराजकताओं के बावजूद भाजपा को इंडिया शाइन करता हुआ नजर आया। चौदहवीं लोकसभा चुनाव में जनता जनार्दन ने भी जवाब दे दिया- अपनी करनी, पार उतरनी…सिंहासन खाली करो कि जनता आती है..

 

मार्क्स को जिन लोगों ने पढा है, उन्हें बताने की कोई जरुरत नहीं कि बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे वामपंथियों का उनसे क्या नाता है? सबसे ज्यादा पढे-लिखे नेताओं का दंभ भरनेवाली वामपंथी पार्टियां किस तरह राजनीतिक शक्तियों का दुरुपयोग करती है, ये अब हंसुआ-हथौ़ड़े चलानेवाले भी समझने लगे हैं।  

 

आधा तीतर, आधा बटेर यानी खिचड़ीफरोश की राजनीति ने भारतीय शासन व्यवस्था का कबाड़ा कर दिया है। हर पार्टी में अपनी डफली, अपना राग का चलन है। नेता अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं के लिए पार्टी की बखिया उघेड़ने में एक पल का भी देर नहीं लगाते। कुछ पुराने नेताओं ने आम नागरिकों के साथ संवाद की परंपरा कायम करने की कोशिश की थी, वो दीया लेकर ढूंढ़ने से भी नहीं मिलती। भारतवर्ष की जनता का विश्वास बार-बार तार-तार होता है।

 

 

भारत के किसान लंगोटी पर ही फाग खेलने के लिए बेबस हैं। आंसू, पसीने और खून से रचे-बसे व्यक्ति की संवेदना भी तकनीक में तब्दील हो गई है।  भारतीय निर्वाचन आयोग की तमाम कोशिशों के बावजूद ऐसे लोगों की तादाद अपनी जगह कायम है, जो कोउ नृप होय, हमें का हानि-चेर छाड़ि न होए रानी- में ही विश्वास रखती है। 

 

राजनीति की चर्चा इसलिए कर रहा हूं कि आज जब एक तरफ देश आजादी की साठवीं सालगिरह मना रहा है, वहीं एक बेहद काबिल और स्वप्नद्रष्टा राष्ट्रपति देश की दयनीय राजनीति की भेंट चढ गया और कहीं कराह तक नहीं उठी। चंद आवाजें फुसफुसिया चुटपुटिये की तरह कहीं धुआं छो़ड़ के रह गईं। दूषित मानसिकता वाले लोग कानून की बजाय मीडिया से कहीं ज्यादा डरते हैं। 

 

बड़े दिनों बाद जब पापा से कुछ बहस हुई तो उन्होंने सवाल दागा कि तुमने अपनी निजी जिंदगी में इतने दिनों में क्या किया?जवाब देना पड़ा- मैंने धीमे आवाज में अपनी पांच खास उपलब्धियां गिना दीं- दिल्ली विश्वविद्यालय से गोल्ड मेडल, हिंदी अकादमी का लेखन के लिए अवार्ड, शीला दीक्षित द्वारा दिया गया बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड, देहमुक्ति की अवधारणा और हिंदी फिल्में- विषय पर शोधकार्य और बारहवीं कक्षा में विज्ञान विषय के साथ जिला में प्रथम और बिहार में तृतीय स्थान। 

 

मेरा पेशा मेरे लिए बहुत कुछ है, उनके लिए बस मेरे जीवनयापन का जरिया। इसे वो उपलब्धि नहीं मानते। हां, मीडिया द्वारा समय-समय पर उठाए गए कुछ कदमों की तारीफ वो दिल खोलकर करते हैं, खैर..उनका जवाब था कि तुम्हारी इन उपलब्धियों से मुझे तो गर्व हो सकता है, समाज शायद उस हद तक गौरवान्वित ना महसूस करे। देश के लिए दलीलें देना आसान है, कुछ करना बेहद मुश्किल..देश के लिए तुमने क्या किया या फिर कभी कुछ कर पाओगे, इसका भरोसा तुम्हे है?

 

 

सवाल स्वाभाविक ही था लेकिन सच पूछिए तो मैं हिल गया। उन्होंने पूरी जिंदगी समाज के लोगों के बारे में सोचने-विचारने और समय-समय पर उनकी यथासंभव मदद करने में गुजार दी। खुद के लिए कभी सोचा ही नहीं। क्या मैं कभी देश के लिए या फिर अपने समाज के लिए ही सही, एक तिनके का भी योगदान कर पाउंगा? जवाब जो भी हो लेकिन इस सवाल ने मुझे चीरकर रख दिया है।  

मैं अरसे बाद जुबान से ना सही लेखनी के जरिये ही आप सभी लोगों के साथ एक बार आवाज लगाना चाहता हूं- इंकलाब… जिंदाबाद…। कलाम ने राष्ट्रपति का पद छो़ड़ेते-छोड़ते युवाओं को संदेश दिया था- उनकी सोच होनी चाहिए- वी कैन डू इट। 

 

मुझे इस पल गजानन माघव मुक्तिबोधकी ये पंक्तियां याद आ रही है— 

तस्वीरें बनाने की इच्छा अभी बाकी हैं

जिंदगी भूरी ही नहीं, वह खाकी है

जमाने ने नगर के कंधे पर हाथ रख

कह दिया साफ-साफ

पैरों के नखों से, या डंडे की नोंक से

धरती की धूल में भी

रेखा खींचकर

तस्वीर बनती है

बशर्ते कि जिंदगी को

चित्र-सी बनाने का

चाव हो

श्रद्धा हो, भाव हो..!      

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  जय हिंद..!                                                                

सभी साथियों को आजादी की साठवीं सालगिरह की बधाई…! 

 

 आपका-

आदर्श कुमार इंकलाब