एक चिंगारी जल रही है
भीतर
उसकी लौ
कभी तेज होती है
कभी सोच-विचार के फेर में
पड़कर
धीमी पड़ जाती है
लेकिन
जब हवाओं का रुख बदलता है
मौसम अंगड़ाई लेती है
बादल मचल उठता है
बारिश डूबो देती है
तन-मन को शांति के सागर में
ऐसे माहौल में भी
हम टटोलते हैं दियासलाई
और सर्द पड़ चुके लाल बूंदों के ऊपर
दौड़ा देते हैं
निराशा के सभी भावों को
फिर जल उठती है छोटी- सी चिंगारी
वही चिंगारी
जिसे हम
अपने मासूम बच्चे की तरह
कलेजे से लगाए
भटकते फिरते हैं
दुलारते हैं उसे
पुचकारते हैं बार-बार
समझाते हैं कि
तुम्हारे होने से ही
काबिज है हमारा अस्तित्व
भले ही दुनिया बदली है
और इस तरह बदली है
कि किसी के लिए
मुमकिन नहीं रह गया है
किसी को पूरे भरोसे के साथ
अपना कहना
गले लगा लेना
फिर हाथ में हाथ लिए
कहना
कि भाई इतने दिनों तक कहां थे?
आप तो बिल्कुल भूल ही गए
अच्छा हुआ आज आप मिल गए
बहुत दिन हो गए थे बात किए हुए।
एक ऐसे दौर में
जब निश्चल हंसी
ढ़ूंढने से नहीं मिलती
कलि-काल के कालचक्र में
मजाक का पात्र
बना दिए जाने के खतरे के बावजूद
तुम्हें खिलखिलाते हुए देखना चाहता हूं
वादा करता हूं
चाहे जितनी लपटें उठें
तुम्हें जलाने के लिए
पर मैं तुम्हें जिलाए रखूंगा
हर हाल में
और तुम हर भंवर से बच निकलोगे
रहोगे बेखौफ
हमारे संग
भक्त प्रहलाद की तरह !
– आदर्श कुमार इंकलाब









