
जिंदगी कभी दोराहे पर खड़ी होती है- कभी चौराहे पर। दिल-दिमाग अलग-अलग रास्तों पर किसी ट्रैफिक पुलिस की तरह नियमों का डंडा दिखाता है। पर मन है जो नहीं मानता बंदिशों को- हालांकि जानता है वो कि अगर हेलमेट न पहनूं तो खतरा मेरे ही ऊपर है- फिर भी। मसला लुत्फ का है- लुत्फ इन बातों में आता है या उन बातों में- ये आप नहीं- आपका दिल तय करता है- या कह सकते हैं आदत- आदत जो आपके अवचेतन मन में पैठ गई है। आप पीछा छुड़ाना चाहते हैं- लेकिन छूट नहीं पातीं- शायद इसलिए इसे आदत कहते हैं- तलब इसका दूसरा नाम है। तलब सिर्फ सुर्ती-सुपारी की नहीं होती- ख्वाबों का सिगरेट और ख्यालों की व्हिस्की भी कम खतरनाक नहीं है। मैं भी इसी का शिकार हूं- निजात पाने की जुगत में लगा हूं- जब कोई नुस्खे की पुड़िया हाथ लगेगी तो बताउंगा आपको भी।
- आदर्श कुमार इंकलाब
हमें भी बताईयेगा …हमें भी इल्म नही है सरकार …
आदर्श बाबू,
प्रणाम!
भटकते-भटकते आपके बलॉग पर पहुंचा- आपकी सभी रचनाएं पढ़ीं।
उम्र और अनुभव में आप मुझसे छोटे हैं- पर कहते हैं कि किसी को समझना हो तो उसकी रचनाएं पढ़ें। आज मन ही मन आपको नमस्कार करने को जी चाहता है। जानकारी के लिए बता दूं कि मैं भी समाजशास्त्र का प्रवक्ता हूं।
बहुत अच्छा लगा। ईश्वर आपको खूब कामयाबी दें। उम्मीद है एक दिन आप समाज के लिए कुछ बेहतर करने में सक्षम होंगे। चलता हूं- फिर आउंगा ब्लॉग पर।
आदर्श बाबू, चुनाव सर पर हैं- कुछ इसके बारे में अपनी कलम से लिखें।
प्रतीक्षा रहेगी। आपके तीनों आलेखों की जितनी प्रशंसा करु- कम लगता है।