Archive for October, 2008
आंखों की चौखट में विश्वास की अल्पना…काशी..!
Posted in संवाद on October 22, 2008 | 2 Comments »
मैंने कल इक सपना देखा…देखा…देखा…सपना देखा!
Posted in संवाद on October 9, 2008 | 6 Comments »
कभी-कभी। कभी-कभी या यूं कहें कि अक्सर जिंदगी में ऐसे पल आते हैं जब आपको सकारात्मक बने रहने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। आप जिंदगी के ताने-बाने में यूं उलझते हैं कि जिंदगी ही खो जाती है। कुछ समझ नहीं आता कि आखिर करें क्या? व्यावसायिक काम-काज निपटाकर जब फुर्सत के दो पल नसीब [...]
चंद्रकांत देवताले की कविताएं
Posted in संवाद on October 6, 2008 | 2 Comments »
‘अकविता’ आंदोलन के प्रमुख कवियों में से एक चंद्रकांत देवताले की- माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविता और माँ जब खाना परोसती थी- दोनों कविताएं भाव और शिल्प दोनों स्तरों पर प्रभावित करती है। आप सबके लिए इन्हें प्रस्तुत करता हूं…
(1) माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविता
अमर चिऊँटियों का एक दस्ता [...]
दुखिया दास कबीर है… !
Posted in संवाद on October 5, 2008 | 2 Comments »
देश में इस समय राजनीति का माहौल चकाचक है। ‘नोट के बदले वोट कांड‘ एक बार फिर से गर्म है। करार के लिए बेकरार पीएम सफल होते जान पड़ रहे हैं। आतंकवादी अपने तरीके से होली-दिवाली मना रहे हैं। पक्ष और प्रतिपक्ष मुखर हैं। चुनाव सन्निकट हैं। दुन्दुभी बज चुकी है। कुल मिलाकर चुनाव लायक [...]