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विविध
Monthly Archives: अक्टूबर 2008
मैंने कल इक सपना देखा…देखा…देखा…सपना देखा!
कभी-कभी। कभी-कभी या यूं कहें कि अक्सर जिंदगी में ऐसे पल आते हैं जब आपको सकारात्मक बने रहने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। आप जिंदगी के ताने-बाने में यूं उलझते हैं कि जिंदगी ही खो जाती है। कुछ समझ नहीं आता कि आखिर करें क्या? व्यावसायिक काम-काज निपटाकर जब फुर्सत के दो पल नसीब होते हैं तो मन सुकून के लिए तड़प उठता है- लेकिन सुकून कहां मिलेगा- पता ही नहीं चलता। फिर हम भटकने लगते हैं- पहले मन भटकता है फिर हम। और भटकते-भटकते कभी नींद आ जाती है तो कभी नींद के इंतजार में ही रात को अलविदा कहना पड़ता है। और अगले रोज हम फिर व्यावसायिक सफर पर निकल पड़ते हैं।
हम लाख रोकें सवाल तो फूट ही पड़ता है कि मन आखिर इतने बेचैन क्यों हो? चाहते क्या हो आखिर?सपने तुमसे या तुम सपनों से कहीं भाग तो नहीं रहे? या फिर तुम्हारा आत्मविश्वास डगमगा रहा है कि तुम कभी उन सपनों के लायक ही नहीं थे। हम जानते हैं हमें जवाब नहीं मिलेगा- क्योंकि जवाब तो हम ही देंगे ना- जो हम देना नहीं चाहते। अजीब पहेली है। हम क्यों ऐसे सवाल उठाते हैं- जिसका जवाब हम खुद ही नहीं जानना चाहते हैं। या साफ कहें कि- डर लगता है। हां- डर तो लगता है- सवाल से भी और जवाब से भी। और इस मामले में विकल्पहीन नहीं है दुनिया- पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है।
क्या करेंगे आप? चाय पीएंगे आप- एक कप- दो कप-तीन कप- जितना चाहे पीजिए- कोई फर्क नहीं पड़ेगा। सिगरेट पीएंगे- रिस्क लेंगे- सेहत से क्यों खिलवाड़ कर रहें हैं- हमें जवाब चाहिए- जवाब तो सिगरेट पीने से भी नहीं मिलेगा- अलबत्ता जिंदगी में बेवजह एक सवाल और जोड़ लेंगे। सिगरेट के कश में भी वो बात नहीं रही। सब फिजूल है। भ्रम है। धुएं की धरोहर है।
बीयर पीएंगे- पीकर देखते हैं- कुछ नहीं मिलेगा- बेचैनी और बढ़ जाएगी – सुकून…आ जा रे- सुकून आपके पुकारे नहीं आएगा। शराब- गटकते हैं तो जिस्म जलता है- रूह भी- फिर क्यों पिए जा रहें है- खुद नहीं पी, दोस्तों ने पिला दी- थोड़ी पी- फिर सुकून तलाशिएगा- फिर सुकून की याद भी जाती रहेगी-अगली सुबह जब उठेंगे तो हेडेक रहेगा- फिर काली चाय-लाल चाय- अगला दिन फिर बर्बाद- अगले दिन सुकून की चाह और बढ़ जाएगी।
बैठ जाइए- बैठ नहीं सकते। सो जाइए- नींद नहीं आती।
क्यूं कर रहें है सुकून का इंतजार- सुकून अगर आ गई तो आप मर जाएंगे- आपका अस्तित्व चिल्लाकर फिर दम तोड़ देगा। मत कीजिए- इंतजार- न सुकून का न ही किसी ऐसी चीज का जो आपके वश में नहीं है। मुश्किल है..पनघट की डगर है..चलना पड़ेगा..नहीं तो पानी हलक तक कैसे उतरेगी। जिंदगी है आपकी या फिल्म…इसकी तो कहानी ही उलझी है…फिर कैमरा लिए कहां जा रहें है…क्या कैद करेंगे कुछ पता भी है…अरे मोबाइल तो लेते जाइए…कोई इंपॉर्टेंट कॉल आ गई तो…बैट्री तो चार्ज है ना…एटीएम से पैसा निकाल लिया है आपने…जाइए जो मन में आए शूट कीजिए- फिर एडिट टेबल पे ठीक कीजिएगा…क्या बनाइएगा तीसरी कसम….दुनिया बनानेवाले क्या तेरे मन में समाई….उसने दुनिया बनाई…आप फिल्म बनाइए…बॉक्स ऑफिस पर चलनी चाहिए- याद रखिए…मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता- कुछ लेना-देना नहीं है- आर्ट हो या कमर्शियल या क्या कहते हैं उसे…समानांतर सिनेमा।
खैर बनाइए चाहे जो भी पहले कैमरा लेकर निकलिए तो सही कि दिमाग से ही बैठे-बैठे पिक्चर शूट कीजिएगा। चलता हूं…कहां…पता नही…लेकिन पिक्चर बनानी है दोस्त…क्योंकि जिंदगी की पिक्चर अभी शूट नहीं हुई है…जिंदगी की पिक्चर तो अभी पूरी बाकी है।
-आदर्श कुमार इंकलाब
( अपने सपने से ही साभार- आखिर ये जमा पूंजी मेरी नहीं मेरे सपनों की है)
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चंद्रकांत देवताले की कविताएं
‘अकविता’ आंदोलन के प्रमुख कवियों में से एक चंद्रकांत देवताले की- माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविता और माँ जब खाना परोसती थी- दोनों कविताएं भाव और शिल्प दोनों स्तरों पर प्रभावित करती है। आप सबके लिए इन्हें प्रस्तुत करता हूं…
(1) माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविता
अमर चिऊँटियों का एक दस्ता मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है
माँ वहाँ हर रोज़ चुटकी-दो-चुटकी आटा डाल देती है
मैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ
यह किस तरह होता होगा
घट्टी पीसने की आवाज़ मुझे घेरने लगती है
और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनिया में ऊँघने लगता हूँ
जब कोई भी माँ छिलके उतार कर
चने, मूँगफली या मटर के दाने नन्हीं हथेलियों पर रख देती है
तब मेरे हाथ अपनी जगह पर थरथराने लगते हैं
माँ ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिए
देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया
मैंने धरती पर कविता लिखी है
चन्द्रमा को गिटार में बदला है
समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूँगा
माँ पर नहीं लिख सकता कविता !
(2) माँ जब खाना परोसती थी
वे दिन बहुत दूर हो गए हैं
जब माँ के बिना परसे पेट भरता ही नहीं था
वे दिन अथाह कुँए में छूट कर गिरी
पीतल की चमकदार बाल्टी की तरह
अभी भी दबे हैं शायद कहीं गहरे
फिर वो दिन आए जब माँ की मौजूदगी में
कौर निगलना तक दुश्वार होने लगा था
जबकि वह अपने सबसे छोटे और बेकार बेटे के लिए
घी की कटोरी लेना कभी नहीं भूलती थी
उसने कभी नहीं पूछा कि मैं दिनभर कहाँ भटकता रहता था
और अपने पान-तम्बाकू के पैसे कहाँ से जुटाता था
अकसर परोसते वक्त वह अधिक सदय होकर
मुझसे बार-बार पूछती होती
और थाली में झुकी गरदन के साथ
मैं रोटी के टुकड़े चबाने की अपनी ही आवाज़ सुनता रहता
वह मेरी भूख और प्यास को रत्ती-रत्ती पहचानती थी
और मेरे अकसर अधपेट खाए उठने पर
बाद में जूठे बरतन अबेरते
चौके में अकेले बड़बड़ाती रहती थी
बरामदे में छिपकर मेरे कान उसके हर शब्द को लपक लेते थे
और आखिर में उसका भगवान के लिए बड़बड़ाना
सबसे खौफनाक सिद्ध होता और तब मैं दरवाज़ा खोल
देर रात के लिए सड़क के एकान्त और
अंधेरे को समर्पित हो जाता
अब ये दिन भी उसी कुँए में लोहे की वज़नी
बाल्टी की तरह पड़े होंगे
अपने बीवी-बच्चों के साथ खाते हुए
अब खाने की वैसी राहत और बेचैनी
दोनों ही ग़ायब हो गई है
अब सब अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी से खाते हैं
और दूसरे के खाने के बारे में एकदम निश्चिन्त रहते हैं
फिर भी कभी-कभार मेथी की भाजी या बेसन होने पर
मेरी भूख और प्यास को रत्ती-रत्ती टोहती उसकी दृष्टि
और आवाज़ तैरने लगती है
और फिर मैं पानी की मदद से खाना गटक कर
कुछ देर के लिए उसी कुँए में डूबी उन्हीं बाल्टियों को
ढूँढता रहता हूँ।
- (प्रस्तुति: वेद रत्न शुक्ल)
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दुखिया दास कबीर है… !
देश में इस समय राजनीति का माहौल चकाचक है। ‘नोट के बदले वोट कांड‘ एक बार फिर से गर्म है। करार के लिए बेकरार पीएम सफल होते जान पड़ रहे हैं। आतंकवादी अपने तरीके से होली-दिवाली मना रहे हैं। पक्ष और प्रतिपक्ष मुखर हैं। चुनाव सन्निकट हैं। दुन्दुभी बज चुकी है। कुल मिलाकर चुनाव लायक माहौल है।
भारतीय लोकतन्त्र में वोट-नोट, सीडी-स्टिंग, कट्टा-कारतूस की मुकम्मल जगह बन चुकी है। अब यह राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति के औजार बन चुके हैं। वर्तमान में अमर सिंह इसके इंजीनियर जान पड़ते हैं। कोई दुविधा नहीं कि अमर सिंह जी कुशल कारीगर और कुशल अभियन्ता हैं। वोट और नोट के बीच वह सेतु का कार्य करते हैं। उनकी महिमा अपरम्पार है। वह खुद सेतु भी हैं और उसके अभियन्ता भी। समकालीन राजनेताओं ने उनका लोहा मान लिया है। उमा भारती सरीखी नेता के ‘कर कमल’ में स्टिंग की सीडी थमाकर उन्होंने वाकई कमाल कर दिया। इतने भर से ही वह चुप बैठने वाले नहीं हैं। हाल ही में उन्होने अपने कारीगरी का एक और नमूना पेश किया। कांड के मुख्य गवाह हस्मत अली को ही पुलिस के हवाले कर दिया। बहुत ही मनोरंजक ड्रामा था। मीडिया को फेवर में करने के लिए प्रणाम और स्तुति गान किया। अमर सिंह वास्तव में बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। कुशल अभियन्ता होने के साथ-साथ वह एक कुशल हास्य अभिनेता भी हैं। इस कैटेगरी में उनकी रैंकिंग नम्बर दो की है। पहले पायदान पर वरदान प्राप्त लालू है। हालांकि अमर सिंह उनको कड़ी टक्कर दे रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने शिवराज पाटिल की मिमिक्री कर डाली। इस मिमिक्री से पत्रकारों और आम जनता का मनोरंजन तो हुआ लेकिन खुद अमर सिंह सांसत में फंस गए। गृहमन्त्री और कांग्रेस कुपित हो गई। ड्रामे का अनापेक्षित अन्त हुआ। हस्मत को दिल्ली पुलिस ने छोड़ दिया। अब वह असलियत बयां कर रहा है। अमर सिंह पर संगीन आरोपों की बरसात कर रहा है। मीडिया अमर के चक्कर में नहीं फंसा। अमर की शिकायत का उल्टा असर हुआ। अब देखना है कि हस्मत की शिकायत को पुलिस कितनी संजीदगी से लेती है। वैसे उसके लिए कोर्ट का दरवाजा भी खुला है। ऐसी स्थिति में मेरी चिन्ता का आर-पार नहीं है। मैं ज्यादा चिन्तित मुलायम सिंह को लेकर हूं। धरतीपुत्र मुलायम सिंह को लेकर। लगता है पहलवान पर बुढ़ापा हावी हो रहा है। वह अमर सिंह की बैशाखी लेकर चलने को मजबूर हैं। मुलायम उसी पुराने तरीके से जिलाध्यक्षों और कार्यकर्ताओं की बैठक कर लाठी-डंडा, जेल-बेल की तैयारी कर रहे हैं। उधर अमर सिंह दिल्ली में माल काट रहे हैं और कैमरों के सामने चमका रहे हैं। अब तो अमर सिंह ने सार्वजनिक रूप से कहना शुरू कर दिया है कि मेरे आगमन से पहले सपा उमाकान्त यादव, रमाकान्त यादव सरीखे गुण्डों से पहचानी जाती थी। मुलायम मौन हैं। बागडोर अमर के हाथों में है। राजनीति के एक कद्दावर की टोपी उछल रही है। मुलायम के मुस्लिम तुष्टीकरण और यादववाद की आलोचना उचित ही है। लेकिन मुलायम उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक जनाधार वाले नेता भी हैं। किसानों, छात्रों तथा गरीबों की मदद करने की उनकी अपनी विशिष्ट स्टाइल है। उनके राज की गुण्डागर्दी को याद करके रोम-रोम अवश्य सिहर उठता है लेकिन अमर सिंह जैसे योजनाकारों के रहते हुए शुभ की आशा भी नहीं की जा सकती।
जामिया का फैसला देश के शेष विश्वविद्यालयों के लिए नजीर बन सकता है। तमाम विश्वविद्यालयों के कुछ छात्र जरायम पेशा हैं। हत्या, अपहरण और लूटपाट के मामलों में छात्रों की गिरफ्तारी आम है। जामिया के फैसले से ऐसे छात्र राहत महसूस कर सकते हैं। सम्बन्धित विश्वविद्यालय या कॉलेज अब उन्हें कानूनी मदद दे सकते हैं। जामिया ने नजीर स्थापित की है। वह भी तब जब उसके दो छात्र आतंकवादी घटनाओं के सिलसिले में गिरफ्तार किये गये हैं। एक तरफ तो उसने इन दोनों छात्रों को निलम्बित भी कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ इनकी बचाव में भी आ खड़ी हुई। जाहिर है कि निलम्बन दिखावटी है। जामिया का फैसला संकेत करता है कि उसे बटाला हाउस की मुठभेड़ पर यकीन नहीं है। अर्जुन सिंह ने भी जामिया के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है। स्पष्ट है कि सरकार को अपने किये पर पछतावा है। आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई पर अब वह पश्चाताप करना चाहती है। रामविलास और फातमी भी राजनैतिक स्यापा कर रहे हैं। बकौल फातमी “कानूनी सहायता उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है।“ फातमी साहब ने सही फरमाया। कानूनी सहयोग सरकार का ही दायित्व है। न्यायालय के आदेश पर ऐसा करना सरकार की जिम्मेदारी है न कि जामिया की जिम्मेदारी। उसे आतंकी और तालबीन के बीच फर्क अवश्य मालूम होगा। कुछ चीजों को कानून के सत्यापन की आवश्यकता नहीं होती। समय आने पर चीजें खुद-बखुद स्पष्ट हो जायेंगी। लेकिन मैं ख्वामख्वाह चिन्तित हूं। कबीर भी चिन्तित थे ‘सुखिया सब संसार है खाये अउ सोवे, दुखिया दास कबीर है जागे अउ रोवे। ‘ दरअसल मेरी चिन्ता इस समय मुलायम सिंह को लेकर है। भविष्य के बारे में पता नहीं।
- वेद रत्न शुक्ल
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