आंतकवाद की समस्या पर पिछले कुछ दिनों से चर्चाओं का बाज़ार गर्म है…हर कोई इसे कोस रहा है और इसके आगे नहीं झुकने की बात भी कर रहा है …ठीक है…मगर सवाल ये है कि नहीं झुक के हम और कितने मोहनचंद को पैदा करेगें …उनके पीछे हम कितने जवान विधवाओं की सूनी मांगों पर आंसू बहाएंगे…तो क्या हम घुटने टेक दें..सवाल ये भी है कि आखिर ये आतंकवादी चाहते क्या हैं..जहां तक मुझे याद है पिछले कुछ दिनों में हुए आंतकवादी घटनाओं के पीछे इन भारतीय आंतकवादियों के होने के पीछे कोई ठोस वजह नहीं थी…ये मुस्लिम समुदाय की नई पीढ़ी है ..जिसके परिवार इतने सक्षम हैं कि उन्हें दिल्ली में तालीम दें सकें….मतलब समस्या पेट और रोजगार का भी नहीं है….तो आखिर ये चाहते क्या हैं…क्या हिंदुओं को जेहाद से मुस्लिम बनाना चाहते हैं…..या धर्म के नाम पर एक और पाकिस्तान की नींव रखना चाहते हैं…….मेरी समझ में इनके पास कोई बेसिक ऐंजेंडा नहीं है…इनके पीछे इनकी असुरक्षा की भावना है…अगर आज तक मुसलमान भारत को अपना देश नहीं मान रहे तो इसमें उनकी मूर्खता के अलावा हमारी असफलता की भी कहानी छिपी हुई है …ये महज संयोग नहीं है कि जामियानगर में पुलिस फायरिंग के दौरान और बाद में वहां के मुस्लिम समुदाय से ये आवाज आ रही थी कि ये इनकाउंटर फर्जी है…पुलिस बदनाम कर रही है…किसी इंसपेक्टर को गोली नहीं लगी है….घर में घुस के गोली मारी है ..यहां से कोई नहीं भाग सकता…पुलिस मुर्दाबाद….रमजान के पाक महीने में ये ठीक नहीं है…और भी बहुत-सी बातें….मगर बहादुर इंस्पेक्टर एच सी शर्मा की मौत के बाद….इन बेकार की बातों पर ब्रेक लगा ….मतलब अगर शर्मा बच जाते तो वहां के मुसलमानों के लिए ये एनकांउटर फर्जी हो जाता….मतलब साफ है एनकाउंटर की सत्यता के लिए एच सी शर्मा जैसे बहादुर सिपाही को मरना होगा……अगर हम उस दिन के वाकये को याद करें तो एच सी शर्मा बिना बुलेटप्रुफ जैकेट के सेल्स मैन के रूप में दाखिल हुए ताकि रमजान के पाक महीने को अपवित्र किए बिना ही उन आतंकवादियों को गिरफ्तार कर लें मगर जब गोली चली-लाशें गिरीं तो एच सी शर्मा को उठा कर कुछ सिविल ड्रेस में पुलिसवाले ले गए उस दौरान सीढ़ी खाली हो गई और दो लोग भाग निकलने में सफल हो गए….आज आजमगढ़ के लोगों की बातें सुनिए …उसे गोली मार दो,अगर वो दोषी हों तो,जांच ठीक से करो….अब सवाल पेचींदा है…जांच वही ठीक होगा जिसमें ये लोग निर्दोष सिद्ध होंगे….और जब दोषी नहीं हैं तो गोली भी नहीं मारी जाएगी..और अगर दोषी सिद्ध हो भी गये तो जांच को ही गलत ठहरा दिया जाएगा….हमारे मुस्लिम भाई जब तक इस मानसिकता से नहीं निकलेगें तब तक मामला नहीं बनेगा…मुझे याद है जब भी भारत पाकिस्तान का मैच होता है तो पाकिस्तान द्वारा मारे गये हर चौके-छक्के या किसी अन्य सफलता पर शाहदरा, सीलमपुर, जामिया में पटाखे उड़ाए जाते हैं…आखिर क्यों…ये खेल भावना है तो भारत के चौके पर भी पटाखे चलने चाहिए ..अगर ये जाति प्रेम है तो भारत में भी मुस्लिम खिलाड़ी है…सच में ये देश द्रोह की छुपी भावना है, जो इन छोटी-मोटी बातों मे निकल आती हैं…(मैं ये नहीं कह सकता कि सभी मुस्लिम इस मानसिकता से ग्रसित हैं)यहां ये भी देखने की बात है कि आखिर जो मुस्लिम भाई इस मानसिकता से ग्रसित हैं, उसके पीछे क्या वजह है…..दरअसल कहीं न कहीं किसी न किसी बात पर उन्हें ये महसूस होता है कि उनके साथ बराबरी का व्यवहार नहीं होता……वो खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं और सोने पर सुहागा ये कि नरेंद्र मोदी जैसे महान व्यक्ति इस भावना को भड़काने में मदद करते हैं….खैर ज़रूरत इस बात की है कि दोनों पक्ष अपनी पारंपरिक सीमाओं को तोड़ें !
- कुणाल कुमार

ये स्वयं ही मुख्य धारा से जुडना नही चाहते । इन्हें अपनों से ज्यादा भरोसा शामापार के संस्थानों से है । औऱ कुछ खाडी के अमीर देश इन्हे पैसा भी मुहय्या कराते हैं ।
असरकारक रचना है आपकी….. सोचने को विवश कर दिया इन चंद पंक्तियों ने…. समर्पित रहिये….
..अगर ये जाति प्रेम है तो भारत में भी मुस्लिम खिलाड़ी है…सच में ये देश द्रोह की छुपी भावना है, जो इन छोटी-मोटी बातों मे निकल आती हैं…
क्या गहरी बात कही आपने……
sahmati sweekaarein…
उपेक्षित होने का मतलब बम विस्फोट करना नहीं होता है। उपेक्षित तो इस देश में कई और लोग है। डोम मुसहर , खुद उन बड़ी जातियों में जो गरीब है, या उन लोगों को जो न्याय नहीं पाते हैं। यह उपेक्षित लोग नहीं है। पहले कहा जाता था कि अशिक्षा के कारण वे ऐसा कर पा रहे हैं । शिक्षा होगी तो स्तर सुधरेगा। लेकिन आज आज गोलडमेडलिस्ट मुसल्मान, कंप्यूटर इंजीनियर, बी ए , एम ए किया मुस्लमान जिसके सामने सुंदर भविष्य है। भविष्य के सुंदर सपने छोड़ जब वह बम विस्फोट करता है तो कितनी कट्टरता हो सकती है । सोचा जा सकता है। नरेन्द्र मोदी पर इल्जाम लगाने वाले लोग गोधरा क्यों भूल जाते हैं। रहीं बजरंग दल , नरेन्द्र मोदी ये आक्रामक नहीं है बल्कि प्रतिक्रियावादी है। एक भी कोई ऐसा दंगा बताये जिसे हिनदुओं ने शुरुआत किया है हां अब वह प्रतिक्रिया करने लगा है तो बुरा लगने लगा है। लेकिन लादेनी मानसिकता प्रतिक्रियावादी नहीं आक्रामकता वादी है जो पूरे विश्व को इस्लमामय करने का भ्रम पाल रखी है। ये उपेक्षित नहीं बल्कि उस मानसिकता के साथी है।
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ilkul khari bat kahi hai aapne.
kunal kumar aap kisi manochikitsak se apna ilaaj karwaiye please