मैं अपने वैचारिक मित्र मिथिलेश के सवालों के जवाब देनें की कोशिश कर रहा हूं-
प्रारम्भ राजकमल चौधरी की कुछ पंक्तियों से करता हूं (हर एक शब्द ठीक से याद नहीं मतलब कुछ इसी तरह है)
जितनी जल्दी हो हमें भाग जाना चाहिये
गांजाखोर साधुओं और रंडियों के बीच….
उनका ये भागना याथार्थ से भागना नहीं है बल्कि खुद को इस पतनशील समाज में रह कर इसका हिस्सा बनने से बचने की कवायद है…आपने कहा कि पहले मुझे खुद ग्रास रूट पर काम करना चाहिए फिर किसी को प्रेरित करना चाहिये…मेरे दोस्त आप ठीक हैं मगर मैं तो बस माहौल तैयार कर रहा हूँ….और अगर कल को मेरे पांव डगमगा भी गये तो कम से कम कुछ लोगों में अलख जगाने के सुख के साथ अपनी बीवी की गोद में सो तो सकता हूं…निश्चित तौर पर किताबों से क्रांति संभव नहीं है….मगर गालिब चाचा ने कहीं लिखा था –
मुझे मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल को खुश रखने को गालिब ये ख्याल अच्छा है
यकीन मानिए मेरे मित्र हर रोज इस व्यवस्था के एक पुर्जे से मैं टकराता हूं…उसका खामियाजा भुगतता हूं और फिर अगले दिन किसी और पुर्जे की खोज में लग जाता हूं …मेरे इस तेवर ने मेरे सामाजिक अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिया है..खैर...
मेरे लेख का मतलब बस इतना था कि भगवान कमजोरों की भाषा है, इसलिए जितनी जल्दी हो सके भाग्यवादी रूख छोड़कर अनलहक के भौतिकवादी रूप को स्वीकार कर लें…और जहां तक सवाल राजनीतिज्ञों का है ..मैं क्षमाप्रार्थी हूं… क्योंकि इस खास विशेषण के खिलाफ मेरे विचार लेख में स्पष्ट है…..मैंने स्पष्ट कहा था कि समय आ गया है कि हम लोकतंत्र की समीक्षा करें क्योंकि मुझे पूर्ण विश्वास है कि ये समीक्षा लोकतंत्र के ह्रास का सूचक होगा…लोकतंत्र….पता नहीं क्यों इस शब्द के आते ही मेरा धूमिलाना तेवर जोर मार उठता है
अपने यहां संसद -
तेली की वह घानी है
जिसमें आधा तेल है
और आधा पानी है
और यदि यह सच नहीं है
तो यहाँ एक ईमानदार आदमी को
अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है?
जिसने सत्य कह दिया है
उसका बुरा हाल क्यों है?
यही नहीं एक कवि ने कहीं ये भी कहा है कि
यहां घोड़े और घास को एक समान छूट है
घास को बढ़ने के लिये और घोड़े को चरने के लिए
इन उद्धरणों का अर्थ ये कतई नहीं कि मैं अपने ज्ञान को बघाड़ रहा हूं…दरअसल अब मेरे शब्द भी खाली हो गये हैं,जिसमें रंग भरने के लिये इनकी आवश्यकता होती है..बहरहाल मेरा विरोध उन तमाम प्रत्यक्ष और परोक्ष….यथार्थ और कल्पना से है- जो शोषण करता है या उसमें सहायक होता है…मेरे मित्र अगर आप समझते हैं कि उड़ीसा या बिहार का बाढ़ भौगोलिक या वातावरण में किसी परिवर्तन के कारण है तो मैं आपसे इत्तेफाक नहीं रखता और फिर से स्पष्ट करना चाहूंगा कि इसका राजनीतिक कारण है…
मैनें अपने लेख में खुले तौर पर कहा था… या तो आप इस समाज को बदल डालिए या फिर भाग जाइये..अर्थात किसी भी स्थिति में इस व्यवस्था का अंग मत बनिए…आज अगर आप हमारे चुनाव के वोट प्रतिशत और हमारे देश की जनसंख्या के अनुपात पर एक नजर डालें तो आप समझ जाएंगे कि बहुत से लोग इस व्यवस्था से अलग हो रहें हैं….मैं अपनी बातों को शैलेन्द्र चौहन की इन पंक्तियों के द्वारा समाप्त करना चाहूंगा-
‘त्रासदी है मात्र इतनी /सोचता और समझता हूं मैं /अभिव्यक्त करता भाव निज / सुख-दुख और यथास्थिति के /पहचानता हूं, हो रहा भेद /आदमी का आदमी के साथ /प्रतिवाद करना चाहता हूं /अन्याय और अत्याचार का । किंतु व्यवस्था /देखना चाहती /मुझे मूक और निश्चेष्ट । नहीं हो सका पत्थर मैं /बावजूद, चौतरफा दबावों के /तथाकथित इस विकास-युग में ।
गुजारिश है एक बार फिर से मेरे लेख को पढें आपको जवाब मिल जाएगा…आशा है आप मेरे तर्कों के बीच अपना जवाब ढूंढ़ लेगें…..
आपका-
कुणाल कुमार