Monthly Archives: सितम्बर 2008

शहीद भगत सिंह को नमन!

तमाम भारतवासियों के लिए प्रेरणास्रोत शहीद भगत सिंह के 101-वें जन्मदिवस पर इंकलाब जिंदाबाद मंच उनके विचारों को हमेशा जिंदा रखने की शपथ लेता है।

तमाम देशवासियों और इंकलाबियों के दिलों में शहीदे-आजम हमेशा बसे रहेंगे धड़कन की तरह।

शहीद भगत सिंह….जिंदाबाद !

इंकलाब…जिंदाबाद !

 

इंकलाब जिंदाबाद मंच

 

आखिर कब तक..?

आंतकवाद की समस्या पर पिछले कुछ दिनों से चर्चाओं का बाज़ार गर्म है…हर कोई इसे कोस रहा है और इसके आगे नहीं झुकने की बात भी कर रहा है …ठीक है…मगर सवाल ये है कि नहीं झुक के हम और कितने मोहनचंद को पैदा करेगें …उनके पीछे हम कितने जवान विधवाओं की सूनी मांगों पर आंसू बहाएंगे…तो क्या हम घुटने टेक दें..सवाल ये भी है कि आखिर ये आतंकवादी चाहते क्या हैं..जहां तक मुझे याद है पिछले कुछ दिनों में हुए आंतकवादी घटनाओं के पीछे इन भारतीय आंतकवादियों के होने के पीछे कोई ठोस वजह नहीं थी…ये मुस्लिम समुदाय की नई पीढ़ी है ..जिसके परिवार इतने सक्षम हैं कि उन्हें दिल्ली में तालीम दें सकें….मतलब समस्या पेट और रोजगार का भी नहीं है….तो आखिर ये चाहते क्या हैं…क्या हिंदुओं को जेहाद से मुस्लिम बनाना चाहते हैं…..या धर्म के नाम पर एक और पाकिस्तान की नींव रखना चाहते हैं…….मेरी समझ में इनके पास कोई बेसिक ऐंजेंडा नहीं है…इनके पीछे इनकी असुरक्षा की भावना है…अगर आज तक मुसलमान भारत को अपना देश नहीं मान रहे तो इसमें उनकी मूर्खता के अलावा हमारी असफलता की भी कहानी छिपी हुई है …ये महज संयोग नहीं है कि जामियानगर में पुलिस फायरिंग के दौरान और बाद में वहां के मुस्लिम समुदाय से ये आवाज आ रही थी कि ये इनकाउंटर फर्जी है…पुलिस बदनाम कर रही है…किसी इंसपेक्टर को गोली नहीं लगी है….घर में घुस के गोली मारी है ..यहां से कोई नहीं भाग सकता…पुलिस मुर्दाबाद….रमजान के पाक महीने में ये ठीक नहीं है…और भी बहुत-सी बातें….मगर बहादुर इंस्पेक्टर एच सी शर्मा की मौत के बाद….इन बेकार की बातों पर ब्रेक लगा ….मतलब अगर शर्मा बच जाते तो वहां के मुसलमानों के लिए ये एनकांउटर फर्जी हो जाता….मतलब साफ है एनकाउंटर की सत्यता के लिए एच सी शर्मा जैसे बहादुर सिपाही को मरना होगा……अगर हम उस दिन के वाकये को याद करें तो एच सी शर्मा बिना बुलेटप्रुफ जैकेट के सेल्स मैन के रूप में दाखिल हुए ताकि रमजान के पाक महीने को अपवित्र किए बिना ही उन आतंकवादियों को गिरफ्तार कर लें मगर जब गोली चली-लाशें गिरीं तो एच सी शर्मा को उठा कर कुछ सिविल ड्रेस में पुलिसवाले ले गए उस दौरान सीढ़ी खाली हो गई और दो लोग भाग निकलने में सफल हो गए….आज आजमगढ़ के लोगों की बातें सुनिए …उसे गोली मार दो,अगर वो दोषी हों तो,जांच ठीक से करो….अब सवाल पेचींदा है…जांच वही ठीक होगा जिसमें ये लोग निर्दोष सिद्ध होंगे….और जब दोषी नहीं हैं तो गोली भी नहीं मारी जाएगी..और अगर दोषी सिद्ध हो भी गये तो जांच को ही गलत ठहरा दिया जाएगा….हमारे मुस्लिम भाई जब तक इस मानसिकता से नहीं निकलेगें तब तक मामला नहीं बनेगा…मुझे याद है जब भी भारत पाकिस्तान का मैच होता है तो पाकिस्तान द्वारा मारे गये हर चौके-छक्के या किसी अन्य सफलता पर शाहदरा, सीलमपुर, जामिया में पटाखे उड़ाए जाते हैं…आखिर क्यों…ये खेल भावना है तो भारत के चौके पर भी पटाखे चलने चाहिए ..अगर ये जाति प्रेम है तो भारत में भी मुस्लिम खिलाड़ी है…सच में ये देश द्रोह की छुपी भावना है, जो इन छोटी-मोटी बातों मे निकल आती हैं…(मैं ये नहीं कह सकता कि सभी मुस्लिम इस मानसिकता से ग्रसित हैं)यहां ये भी देखने की बात है कि आखिर जो मुस्लिम भाई इस मानसिकता से ग्रसित हैं, उसके पीछे क्या वजह है…..दरअसल कहीं न कहीं किसी न किसी बात पर उन्हें ये महसूस होता है कि उनके साथ बराबरी का व्यवहार नहीं होता……वो खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं और सोने पर सुहागा ये कि नरेंद्र मोदी जैसे महान व्यक्ति इस भावना को भड़काने में मदद करते हैं….खैर ज़रूरत इस बात की है कि दोनों पक्ष अपनी पारंपरिक सीमाओं को तोड़ें  !

 - कुणाल कुमार

 

कितनी सहूलियत हो अगर आतंकवादी रोज विस्फोट करें!

देश की राजमंडली लकदक रहे तो कितना ठीक है। राजा साहिब बनाव-श्रृंगार नहीं करेंगे तो भला कौन करेगा, मेरा मंगरुआ। गृह मन्त्री शिवराज पाटिल छैला बनकर नहीं घूमेंगे तो कौन घूमेगा। वैसे भी मुझको उनमें फिल्मी खलनायक अजीत या प्राण का अक्स नजर आता है। आप को अगर ठीक से याद आता हो तो बताइयेगा कि शिवराज बाबू किस फिल्मी पर्सनैलिटी की तरह लगते हैं। बहरहाल, शिवराज बाबू ने लोगों के सुविधानुसार ही वस्त्र धारण किया। विस्फोट से पहले पार्टी मीटिंग में गए तो बिल्कुल सौम्य ग्रे कलर का सूट पहनकर। वहां सोनिया-वोनिया जी कितने सारे लोग रहते हैं। मीडिया के सामने आए तो थोड़ा गहरे कलर का सूट पहन लिया। मीडियावाले ही बताएं कि आखिर कैमरे के सामने कपड़ों के रंग का महत्व होता है कि नहीं? बेचारे सुविधा भी प्रदान करते रहें और खिंचाई भी होती रहे, कैसा जमाना आ गया है। उसके बाद अस्पताल गये, मर-मरा गये और घायल लोगों का हालचाल लेने तो सफेद रंग का सूट पहन लिया। मीडिया के लोग जैसे सिनेमा देखते ही नहीं हैं। देखते नहीं वहां दरवाजे पर लाश पड़ी रहती है और परिजन एकदम झक सफेद कपड़े पहनकर विलाप करते हैं। कितने धैर्यशाली लोग होते हैं। घर में मौत पक्की हुई तो तुरन्त दहाड़ें मारना नहीं शुरू करते गंवारों की तरह। पहले जाते हैं वार्डरोब में से फ्यूनरल ड्रेस निकालते हैं तब रोना-धोना शुरू करते हैं। चाहे स्त्री हो या पुरुष सभी इस तरह का संयत व्यवहार करते हैं। इन फिल्मों को देखकर मुझे लगता है कि जरूर धनवान लोग दो-तीन जोड़ी फ्यूनरल ड्रेस बनवाकर रखते होंगे। तो अपने शिवराज जी भी सफेद सूट-बूट पहनकर गए शोक-संवेदना जताने।
आतंकवादियों ने अपने तयशुदा कार्यक्रम के तहत दिल्ली में बम विस्फोट कर दिया। उन्हें तो ऐसा करना ही था। अल्लाह के बन्दे हैं जो चाहें सो करें। कौन है उनको रोकने वाला। हमारी सरकार भी कम होशियार थोड़े है। उनकी इस घिनौनी हरकत से भी वह कुछ नया सीख लेती है। बकौल गृह सचिव हर बार के विस्फोट से अपना गृह मन्त्रालय कुछ नया सीखता है।कितनी सहूलियत हो अगर आतंकवादी रोज विस्फोट करें, अपना गृह मन्त्रालय रोज कुछ न कुछ नया सीखेगा। मुफ्त की क्लास, मुफ्त का ज्ञान। कुल मिलाकर मुफ्त की पाठशाला। दरअसल इस्लामिक आतंकवाद के कीड़े पैर पसार चुके हैं और हमारी व्यवस्था से तो अब पायरिया की सी बदबू आने लगी है।
मैंने शुरू में ही देश के राजमंडली की जय कर दी है। झूठे थोड़े ही की है। वहां लालूजी हैं, रामविलास भाई हैं। दोनों सिमी समर्थक हैं। रामविलास भाई लादेन के भी जबर्दस्त फैन हैं। याद कीजिए २००४ बिहार विधानसभा का चुनाव। उस समय रामविलास भाई लादेन के एक हमशक्ल को लेकर चुनाव प्रचार कर रहे थे, तब भी मैंने लिखा था कि ऐसा करके वह एक समुदाय विशेष को कटघरे में खड़े कर रहे हैं। सौभाग्य से लादेन या रामविलास को मुसलमानों का समर्थन नहीं प्राप्त हुआ। लेकिन ऐसे धुरंधरों के रहते हुए आतंकवादियों को निश्चित राहत महसूस होती होगी। सोचते होंगे कि हमारा भी कोई तगड़ा आदमी वहां है। वैसे भी इस मुल्क में उनके तमाम हित-बन्धु पैदा हो गए हैं। कोई डॉक्टर है तो कोई इन्जीनियर, कोई मुल्ला तो कोई मौलवी, कोई कुछ तो कोई कुछ। उनको पूरी तरह मुतमईन रहना चाहिए। दिग्गज धर्मनिर्पेक्षों के रहते उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। आतंकवादी अबुल बशर की गिरफ्तारी होगी तो एक से एक आला नेता पहुंचेंगे। जरूरी राहत और इमदाद देंगे। ऐसे में हे प्यारे आतंकवादियों! एकदम निश्चिन्त रहो, मन लगाकर अपना काम करो। लेकिन शिवराज भाई जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी।

                     

                            -वेद रत्न शुक्ल

वैचारिक मित्र मिथिलेश के सवालों के जवाब

मैं अपने वैचारिक मित्र मिथिलेश के सवालों के जवाब देनें की कोशिश कर रहा हूं-

 

प्रारम्भ राजकमल चौधरी की कुछ पंक्तियों से करता हूं (हर एक शब्द ठीक से याद नहीं मतलब कुछ इसी तरह है)

जितनी जल्दी हो हमें भाग जाना चाहिये

गांजाखोर साधुओं और रंडियों के बीच….

उनका ये भागना याथार्थ से भागना नहीं है बल्कि खुद को इस पतनशील समाज में रह कर इसका हिस्सा बनने से बचने की कवायद है…आपने कहा कि पहले मुझे खुद ग्रास रूट पर काम करना चाहिए फिर किसी को प्रेरित करना चाहिये…मेरे दोस्त आप ठीक हैं मगर मैं तो बस माहौल तैयार कर रहा हूँ….और अगर कल को मेरे पांव डगमगा भी गये तो कम से कम कुछ लोगों में अलख जगाने के सुख के साथ अपनी बीवी की गोद में सो तो सकता हूं…निश्चित तौर पर किताबों से क्रांति संभव नहीं है….मगर गालिब चाचा ने कहीं लिखा था –

मुझे मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन

दिल को खुश रखने को गालिब ये ख्याल अच्छा है

यकीन मानि मेरे मित्र हर रोज इस व्यवस्था के एक पुर्जे से मैं टकराता हूंउसका खामियाजा भुगतता हूं और फिर अगले दिन किसी और पुर्जे की खोज में लग जाता हूंमेरे इस तेवर ने मेरे सामाजिक अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिया है..खैर...

मेरे लेख का मतलब बस इतना था कि भगवान कमजोरों की भाषा है, इसलिए जितनी जल्दी हो सके भाग्यवादी रूख छोड़कर अनलहक के भौतिकवादी रूप को स्वीकार कर लें…और जहां तक सवाल राजनीतिज्ञों का है ..मैं क्षमाप्रार्थी हूं… क्योंकि इस खास विशेषण के खिलाफ मेरे विचार लेख में स्पष्ट है…..मैंने स्पष्ट कहा था कि समय आ गया है कि हम लोकतंत्र की समीक्षा करें क्योंकि मुझे पूर्ण विश्वास है कि ये समीक्षा लोकतंत्र के ह्रास का सूचक होगा…लोकतंत्र….पता नहीं क्यों इस शब्द के आते ही मेरा धूमिलाना तेवर जोर मार उठता है

अपने यहां संसद -
तेली की वह घानी है
जिसमें आधा तेल है
और आधा पानी है
और यदि यह सच नहीं है
तो यहाँ एक ईमानदार आदमी को
अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है?
जिसने सत्य कह दिया है
उसका बुरा हाल क्यों है?

यही नहीं एक कवि ने कहीं ये भी कहा है कि

यहां घोड़े और घास को एक समान छूट है

घास को बढ़ने के लिये और घोड़े को चरने के लिए

इन उद्धरणों का अर्थ ये कतई नहीं कि मैं अपने ज्ञान को बघाड़ रहा हूं…दरअसल अब मेरे शब्द भी खाली हो गये हैं,जिसमें रंग भरने के लिये इनकी आवश्यकता होती है..बहरहाल मेरा विरोध उन तमाम प्रत्यक्ष और परोक्ष….यथार्थ और कल्पना से है- जो शोषण करता है या उसमें सहायक होता है…मेरे मित्र अगर आप समझते हैं कि उड़ीसा या बिहार का बाढ़ भौगोलिक या वातावरण में किसी परिवर्तन के कारण है तो मैं आपसे इत्तेफाक नहीं रखता और फिर से स्पष्ट करना चाहूंगा कि इसका राजनीतिक कारण है…

मैनें अपने लेख में खुले तौर पर कहा था… या तो आप इस समाज को बदल डालिए या फिर भाग जाइये..अर्थात किसी भी स्थिति में इस व्यवस्था का अंग मत बनिए…आज अगर आप हमारे चुनाव के वोट प्रतिशत और हमारे देश की जनसंख्या के अनुपात पर एक नजर डालें तो आप समझ जाएंगे कि बहुत से लोग इस व्यवस्था से अलग हो रहें हैं….मैं अपनी बातों को शैलेन्द्र चौहन की इन पंक्तियों के द्वारा समाप्त करना चाहूंगा-

 त्रासदी है मात्र इतनी /सोचता और समझता हूं मैं /अभिव्यक्त करता भाव निज / सुख-दुख और यथास्थिति के /पहचानता हूं, हो रहा भेद /आदमी का आदमी के साथ /प्रतिवाद करना चाहता हूं /अन्याय और अत्याचार का किंतु व्यवस्था /देखना चाहती /मुझे मूक और निश्चेष्ट नहीं हो सका पत्थर मैं /बावजूद, चौतरफा दबावों के /तथाकथित इस विकास-युग में   

गुजारिश है एक बार फिर से मेरे लेख को पढें आपको जवाब मिल जाएगा…आशा है आप मेरे तर्कों के बीच अपना जवाब ढूंढ़ लेगें…..

 आपका-

    कुणाल कुमार

आपके आलेख का इंतजार!

 

क्या वाकई में ईश्वर हैं?

इस विषय पर अपने आलेख वर्ड अटैचमेंट के साथ हमें

adarsh_272@rediffmail.com पर भेजें।

आप अपने आलेख कमेंट में भी पोस्ट कर सकते हैं।

हम वहां से उठाकर मुख्य पृष्ठ पर डाल देंगे।

जल्दी करें- तमाम इंकलाबी बंधुओं को आपके विचारों का बेसब्री से इंतजार है।

इंकलाब जिंदाबाद!

जय हिंद, जय भारत!

 

आपका-

आदर्श कुमार इंकलाब

क्या वाकई ईश्वर हैं?

 

सभी भारतवासियों को आदर्श कुमार इंकलाब का नमस्कार!

हमारे इंकलाबी बंधु बनारस के रघुवीरजी की गुजारिश है कि- क्या ईश्वर नामक संस्था का वाकई कोई अस्तित्व है?- इस मसले पर सार्थक बहस होनी चाहिए। ये एक जटिल प्रश्न है, जिससे हम सभी मानसिक तौर पर यदा-कदा जूझते रहते हैं। जिंदगी में कई बार ऐसा लगता है कि भगवान है ही नहीं- अगर होते तो ऐसा क्यों होता- वैसा क्यों होता? कुछ लोग ये भी कहते हैं कि जो अच्छे व्यक्ति होते हैं- उन्हें जिंदगी में ज्यादा दुख-तकलीफ का सामना करना पड़ता है- वो जिंदगी में बहुत पीछे छूट जाते हैं- और जो तमाम कुविचारों के चंगुल में होते हैं- उनकी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की होती है- वे ज्यादा खुश रहते हैं। खैर, हम चाहते हैं कि इस प्रश्न पर आप सभी अपने व्यक्तिगत, ठोस और यथार्थ पर आधारित विचार रखें। अपने निजी अनुभव हमसे बांट सकते हैं। इस सवाल पर बहस करते हुए हमें अपनी बात रखनी है काल्पनिक और पुरातन ग्रंथों के संदर्भों का जिक्र करने की बजाय वैज्ञानिक और आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भी सवाल को टटोलने की कोशिश होनी चाहिए।

उम्मीद है कि आप सभी इस विषय पर उत्साह से भाग लेंगे और अपने विचार को इंकलाब के मंच पर सभी के साथ साझा करेंगे। 

 आपका-

आदर्श कुमार इंकलाब

 

 

समस्याएं प्रतिरोध से खत्म होती है!

 

 

( हमारे इंकलाबी भाई कुणाल के आलेख- कैसा लोकतंत्र और कहां का लोकतंत्र?- के संदर्भ में मेरे विचार)

 

कुणाल जी, आपकी बातें तो सही हैंलेकिन मुझे ये नहीं समझ में आया कि आपका आक्रोश राजनीजिज्ञों के प्रति ज्यादा हैया फिर भगवान के प्रतियदि भगवान को आप वाकई नपुंसक संस्था मानते हैंजो कुछ कर ही नहीं सकती तो फिर उस पर बार-बार सवाल उठाना गलत हैऔर यदि आप उड़ीसा और बंगलौर का उदाहरण दे रहे हैंतो आपको फ्रांस, अमेरिका, और इस्लामिक देशों का भी उदाहरण देना चाहिए…. आपको उस वर्ग विशेष का भी उल्लेख करना चाहिए जो भगवान नामक संस्था से तो नफरत करता हैलेकिन विवाह के समय अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लेता है…. बिना मौलवी या पादरी के शादी नहीं करता हैव्यक्तित्व का ये दोहरापन पहले खत्म करना पड़ेगाजो राजनीतिज्ञों की पहचान हैआंदोलन शुरू करिए लेकिन पहले तो आंदोलनकारी को खुद वस्तुनिष्ठ होना पड़ेगाये जानना पड़ेगा कि आप का आंदोलन वाकई है किसके खिलाफविचारधारा किताबों से नहीं बनतीएक सोच होती हैएक व्यक्तित्व होता हैलीक पर चलने से वही हासिल होगा जो अब तक होता आया हैसमस्याएं पलायन या किसी के अस्तित्व को नकारने से खत्म नहीं होतींसमस्याएं प्रतिरोध से खत्म होती हैंआप पूरे सिस्टम से विद्रोह नहीं कर सकतेआप तानाशाही रवैया भी नहीं अपना सकतेकिसी को नकार कर जीतना आसान हैउसे स्वीकार करिए कुणाल जीऔर फिर उसका समाधान करिएबहस जारी रहे तो बेहतर है

 

                                 

                                         -मिथिलेश सिंह

तुम्हारे खात्मे के लिए प्रतिबद्ध हैं हम!

आज सुबह टीवी पर दिल्ली धमाकों से जुड़ी साउथ दिल्ली के डीसीपी एचजीएस धालीवाल की प्रेस कॉन्फ्रेंस सुनी…सुनकर सबसे पहले मुंह से यही निकला कि क्या हम तैयार हैं…इन आतंकियों से मुकाबले को…ये सवाल मन में इस लिए उठा कि डीसीपी साहब ने कहा कि गिरोह का मुखिया आतिफ गिरोह के हर सदस्य की दाढ़ी-मूंछ कितनी होनी चाहिए…इस बात तक पर कड़ी नजर रखता था…इस पीसी में कई और अहम खुलासे भी हुए लेकिन…एक बात मन को बहुत कचोट रही है…वो ये कि अब केवल पढ़े लिखे ही नहीं बल्कि प्रफेशनल लोग भी आतंकी गतिविधियों में संलिप्त पाए जा रहे हैं…एक आतंकी एमबीए कर रहा है…तो दूसरा एमए इकोनॉमिक्स का छात्र है…तीसरा बीए का छात्र…चौंकाने वाली बात इनकी उम्र है…इनमें सबसे ज्यादा उम्र जुनैद की 27 साल है…हमारी देश की 55 फीसदी आबादी 30 साल से नीचे की है…जरा सोचिए ये आंकड़ा सोचनीय है…सोचनीय बात ये भी है कि कैसे और किस कदर तक लोग बरगलाए जा रहे हैं…क्यों एक इंसान दूसरे की जान लेने पर आमादा है…क्या इंसान की जान इतनी सस्ती हो गई है…इन सबके जवाब आपके और हमारे पास ही हैं…क्योंकि ये लोग हमारे बीच ही रहते हैं…और बीच में ही रहते हुए वारदातों को अंजाम देते हैं…खैर आतंकवाद इस देश ही नहीं दुनिया में इस वक्त चरम पर है…जिसका खात्मा बेहद जरूरी है…आखिर में उस शहीद को श्रृद्धांजलि जो आतंकियों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ…ईश्वर से कामना है कि इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा के परिवारवालों को इस संकट की घड़ी में साहस दें…और आतंकियों को मेरी चुनौती की कर लो जितनी मर्जी आए…हम न झुके हैं..और न ही झुकेंगे…क्योंकि हम तुम्हारे खात्मे को प्रतिबद्ध हैं।

 

जय हिंद

जय भारत ! 

रतीश त्रिवेदी

कैसा लोकतंत्र, कहां का लोकतंत्र ?

अभी दिल्ली में आंतकीं बम धमाकों की गूँज थमी भी नहीं थी कि बंगलुरू में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं नें कर दिया सात चर्चों पर हमला…..इससे पहले उड़ीसा में विश्व हिंदू परिषद के एक नेता की नक्सलियों द्वारा हत्या का खामियाजा भी वहाँ के ईसाइयों को भुगतना पड़ा था जिस में काफी जान माल की क्षति हुई थी ….और अब बंगलुरू में कानून और नैतिकता को अगूंठा दिखाते हुए बजरंग दल की ये कार्रवाई देश को अस्थि्र करने का प्रयास है …इस तरह के संगठनों पर प्रतिबंध लगाने की बात पहले से ही वामदल करते आए हैं देखना ये होगा कि वोट की राजनीति करने वाले दल कब तक इनसे मुंह चुराकर भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को धूमिल करते रहेगें ।अगर हम बात करें दिल्ली के बम धमाको की तो दिल्ली में हुआ ये धमाका न तो पहला है और न ही अन्तिम । न ही इस पर राजनीतिक पार्टियों सहित प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति,पुलिस या किसी अन्य जिम्मेदार व्यक्ति या संस्था के बयान में ही कुछ नया है ।बस हर बार एक ही बात को नए-नए शब्दों मे सजा कर ये कहते हैं और हम सुनते हैं ।आतंकवाद आज समस्या है और इसे खत्म करने के लिए एक साथ ही कई जगहों पर काम करने की ज़रूरत है।सनद रहे कि अपने देश में और भी कई तरह की समस्याएँ हैं जो इससे ज्यादा खतरनाक है …

 

आज अगर इतने वर्षों तक कश्मीर में रह कर हम वहाँ के बाशिदें का विश्वास नहीं जीत पाए तो ये हमारी सबसे बड़ी असफलता है जिसे हमें स्वीकार करना चाहिये ।कश्मीर समस्या का सामाधान न तो सिर्फ राजनीतिक  तौर पर किया जा सकता है और न ही सिर्फ भौगलिक गणित के सिंद्धात पर ।मगर इसमें कोई शक नहीं कि इस समस्या का जड़ राजनीति से नाभिबद्ध है । अभी तक देश में जितने भी आतंकी हमले हुए हैं उसके हताहतों में राजनीति करने वाले कितने थे रईसजदा कितनें थे और आम नागरिक कितने थे । ये अनुपात हमें भगवान नामक संस्था से नफरत करनें के लिए प्रेरित कर सकता है ।बहरहाल हमारे देश की राजनीति से ही एक आवाज उठी थी जिंदा कौमें पाँच साल इन्तज़ार नहीं करती तो क्या सरकार बदल कर इस समस्या से छूटकार पाया जा सकता है । अगर आपको याद हो तो पीछली सरकार के दौरान विमान अपहरण और संसद पर हमला हो चुका है, जिसके जबाव में तत्कालीन सरकार ने लाखों रूपये खर्च कर सेना को सीमा पर खड़ा कर दिया था ।सनद रहे उस दौरान कहा गया था कि ये हमला लोकतंत्र पर है इसीलिए—– अब आर या पार होगा।—कैसा लोकतंत्र कहां का लोकतंत्र ।जो सरकार या व्यक्ति सोचता है कि लोकतंत्र का मतलब पथ्थरों के दिवार से बने एक महलनुमा संसद भवन हैं तो मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता ।लोकतंत्र को अबला नारी की तरह नचाने वाले अगर ऐसा कह रहे थे तो इसके पीछे उनकी अपनी सुरक्षा का भय था ।अगर भारत में कहीं लोकतंत्र है (जिसे मैं नहीं मानता) तो वे उस ठेले वाले और चाय बेचने वालें में ज्याद बसता है जिसकी मौत इस तरह के बम धमाकों मे होती है ।धूमिल ने कहीं लिखा था-              

                देश के करीब वही है

                जो भूखा या गरीब है

 

देश में आंतकवाद की समस्या पर हमारे राजनीतिज्ञ सीमा पार की बात कर अपने दायित्व का निर्वाह कर लेते हैं ।मगर ये महान आत्मा ये नहीं कहते की अबतक नक्सलवाद ने जितनी जाने ली है उसका जड़ कहाँ और कैसे है ।वो नॉर्थ-ईस्ट की समस्या को या फिर रोज हो रहे किसानों की आत्महत्याओं को क्या कहेगें । अभी बिहार में आये बाढ़ में गई जान के बारे में क्या कहेगें।बिहार की समस्या एक भयानक त्रासदी में बदल चुकी है जिसके लिए देश का हर नागरीक जिम्मेदार है । और मुझे आश्चचर्य इस बात को लेकर है कि इतने गाली और पीटाई खाने के बाद भी अब तक वहाँ से क्षेत्रवाद की आवाज क्यों नहीं उठी ।गोकि अधिकतर पूर्वाचलियों के बहन के साथ देश के बहुत बड़े हिस्से के लोग अपना निकटरम और गोपनीय संबंध घोषित करते रहें है ।बहरहाल समस्या एक नहीं है मगर इसका समधान एक है और वो है लोकतंत्र की समीक्षा। यहाँ मुझे रघुवीर सहाय की एक कविता याद आ रही है (एक-एक शब्द तो याद नहीं मगर मतलब कुछ इसी तरह है)

  

              21वीं सदी के इंजिनियरों ईजाद करो

              ऐसा घोड़ा गाड़ी जिसमें घोड़ा और घुड़सवार

              साथ-साथ बैठे हों

              तुम पूछोगे इससे क्या

              तो जब घोड़े को किछ पूछना पड़े तो

              उसे मुंह उठा कर पीछे न देखना पड़े

 

अब सूरतेहाल ये है कि ये सरकार, ये व्यवस्था गोली और बम की आवाज भी नहीं सुनती । तो भला ये बम धमाकों से क्या होगा।हे मेरे देश के यूवागण उठो और जितनी जल्दी हो इस व्यवस्था खुद को अलग कर लो क्योंकि जब इतिहास लिखा जाएगा तो  कम से कम हमारा नाम तो उस पन्ने में नहीं आयेगा। इस से पहले की तुम्हें भी ये व्यवस्था अपवे अनुकूल बना ले संभल जाओ ।इससे पहले की तुम भी अपनी बीवी के घूटनों सर रख कर कहो कि मैं ये कर सकता था ।इससे पहले की तुम भ इस दुनिया की सबसे बड़ी नपुंसक संस्था भगवान में विश्वास हो जाये ।सब कुछ को बदल डालो और नहीं तो फिर भाग चलो इस दुनिया से ,इस समाज से । 

              

                                                              – कुणाल कुमार

सवाल 30 लाख जिंदगियों का

 

बिहार के करीब 30 लाख लोग कोसी के कहर के शिकार है। इस महाप्रलय की घड़ी में उनकी मदद कीजिए। मदद किस तरह की जाए- इसके लिए सोचिए और जुट जाइए। लेकिन ध्यान रखिए कि आपके द्वारा दी जानेवाली मदद जरूरतमंदों तक पहुंच सके- कहीं ऐसा न हो कि बिचौलिए उसे अपनी जेब के हवाले कर लें। इस संकट की घड़ी में हर भारतवासी का फर्ज बनता है कि वो जिस हद तक हो सकता है- अपनी तरफ से उन लोगों की सहायता करें, जिन पर ये आफत आन पड़ी है। ये वक्त किसी बहस, विश्लेषण और राजनेताओं पर टीका-टिप्पणी करने का नहीं है। इस समय बस हमें उनलोगों की मदद करने की जरूरत है। मदद के लिए देश के लोगों को प्रेरित करने की आवश्यकता है।

 

आपका-

आदर्श कुमार इंकलाब