उस स्त्री ने बच्ची को नहलाया
कपड़े पहनाए
और फिर
आरती पर
साथ लेकर बैठ गयी उसे।
बच्ची ने हाथ जोड़े
प्रसाद खाया
और जैसे-जैसे माँ करती गयी
नकल उतारती रही वह
सुबह शाम
घंटी बजाने की जिद
धूप सुलगाने की ललक
बच्ची में
पनपती चली गयी माँ की तरह।
दिन बीते
अब वह बड़ी हो गयी थी
माँ से सोचती थी अलग
कुछ बताती थी
और ज्यादा छिपाती थी।
अलग अस्तित्व
पहचान की [...]
Archive for June, 2008
परंपरा,प्रवाह और संस्कृति
Posted in संवाद on June 10, 2008 | 4 Comments »
जो सींच गए खूं से धरती……!
Posted in संवाद on June 3, 2008 | 3 Comments »
मेरे भारत की आजादी, जिनकी बेमौल निशानी है।
जो सींच गए खूं से धरती, इक उनकी अमर कहानी है।
वो स्वतंत्रता के अग्रदूत, बन दीप सहारा देते थे।
खुद अपने घर को जला-जला, मां को उजियारा देते थे।
उनके शोणित की बूंद-बूंद, इस धरती पर बलिहारी थी।
हर तूफानी ताकत उनके, पौरुष के आगे हारी थी।
मॉ की [...]
महाकाव्य
Posted in संवाद on June 2, 2008 | 3 Comments »
लड़की
घर से निकलती थी
करने को काम
बस में लड़ती थी
सड़कों पर भी जारी थी उसकी जंग
आफिस में बॉस की निगाहों से जूझती थी
रोज लड़की
मॉं-बाप की चौकस निगरानी
भाई की बहादुरी की कहानी
से लड़ती थी लड़की
अपनी आदिम पनाहगाह में भी
अल्ट्रासाउंड की किरणों से युद्धरत थी लड़की
अकेले
आधुनिक सभ्यता
इस घनघोर वैज्ञानिक तार्किक
और विवेकवान समय में
आफिस से घर तक
सुबह से शाम [...]