कोलाहल है मचा
धरती रही उबल
इंसान की फितरत में
नहीं है सुधरने का शगल
पृथ्वी तप रही है। इंसान को इसकी चिंता नहीं है। हो भी क्यों। उसके घर में एसी है, कूलर है, पंखा है। हिमखण्ड पिघल रहे है। नदियां उफान पर है। पर इंसान क्या करें। उसके घर, पानी है, फ्रिज है, बर्फ है। खेतों में सूखा पड़ रहा है। पर इंसान के घर खाना है, अनाज है और है ईंधन। तो क्या इसे नियामत की भूल कहें। या किसी एक सभ्यता के कर्मों की बानगी। हवा में तपिश, बादलों में रूखापन, पानी में जलन, माहौल में उमस और पसीने का कंटक। ये बदलाव आ चुका है। दिल्ली की तपती दोपहरी में आप जल रहे है। मुंबई में सागर है, सो तापमान टिका है, लेकिन यही समुद्र लील लेगा, एक दिन एक बड़ी आबादी। धीरे धीरे वो अपना दायरा बढ़ाएगा, और इंसान का चूल्हा चौका सोफा बिस्तरा और दीवाले ढह जाएंगी। कोलकाता में आबादी का समुद्र है, सो एक अकाल वहां इंतजार में है। अकाल से मौत होना जायज है। असंख्यों की मौत। चेन्नई का मरीना बीच सुंदर है। लोग सामान्यता में जीते है। लेकिन पानी उन्हे नहीं बख्शेगा। भारत जैसे देश को गंगा जोड़ती है। गंगा में उफान पाप नहीं धुलेगा, पापी का नाश ही कर देगा। और ये सब करने के बाद गंगा वापस लौट जाएगी। शिव की जटाओं में। डरना जरूरी है। आप नहीं आपका संसार सिसकेगा। पानी और धूप के बीच का नाता टूट जाएगा। और रह जाएगी भाप। गर्म भाप। जो खेतों की माटी में छोटी छोटी दरारें पैदा कर देगी। जो फसलों की हरियाली से जलन रखेगी। जो बादलों के धुंधलके से खार खाएगी। और देगी एक नीरस मौसम। गर्म मौसम। जाड़ों की चाहत और स्वेटर पर चलते हाथ रूक जाएंगे। और बहेगी लू। करीब ही आग से लौ निकलेगी और जंगलों में वो सूखे पत्तों से दोस्ती गांठ कर एक चिरचिराहट के साथ सब कुछ लालिमा में लाकर, काला कर देगी। चिंगारी से कही भी कुछ भी खाक में बदल जाएगा। और आप के चेहरे पर पसीना बना रहेगा।
ये ग्लोबल वार्मिंग है। वैश्विक गर्मी। जो आपके हमारे और हम सबके किए गए प्राकृतिक अत्याचारों का नतीजा है। हमने पेड़ काटे, हमने गाड़िया दौड़ाई, हमने उर्जा का दोहन किया, और उसके बदले दिया पृथ्वी को धुआं और अप्राकृतिक उष्मा। जिसका परिणाम है असंतुलन। हिमखण्डों ने पिघलना शुरू कर दिया है। वे अब सिमट रहे है। अपना अस्तित्व खो रहे है। और अपनी जलधाराओं को सोख रहे है। वे अब गर्मी से हार चुके है। और अपना सारा गुस्सा अब उतारने के करीब खड़े है। तो क्या मानव जाति को अब दिन गिनने चाहिए। क्या अब करने को कुछ बचा है। क्या हम फिर से संतुलित हो पाएंगे।
हां। पर केवल आपके त्यागने से। केवल आपके छोड़ने और लागू करने से। क्या तैयार है कल से साइकिल से आफिस जाने के लिए। चीनी, जापानी ये कर रहे है। पर आप तो उनसे बड़े है। क्या तैयार है बायोडिग्रेडेबिल साधनों पर खाना बनाने के लिए। पर आप तो बिना माइक्रोवेव ओवन के खा ही नहीं सकते है। मैं सबकी बात नहीं करता। पर कारकों की बात जरूरी है। तो क्या कल से मान लूं कि एयरकंडीशनर के बिना आप सो लेंगे आप। कैसे, गर्मी इतनी है, मैं सड़ नहीं सकता। पर यकीन जानिए। आज केवल हर घर घर में गर्मी को रोककर आप अपने नौनिहालों को हीटरी वातावरण में जीने से रोक सकते है। मेरी बात पर नहीं यकीन है, तो आज की दोपहर अपने शहर में नंगे पांव निकल कर देखिए। छाले न प़ड़ जाएं तो कहिएगा। इसे ऐसा आपने बनाया है। और अगर इसे और भयावह नहीं बनाना चाहते तो रूक जाइए। वरना ग्लोबल वार्मिंग का पहला असर आपके पानी, धूप, खाने, ईंधन और जिंदगी पर पड़ेगा। और जिसे झेलने की ताकत आपमें नहीं बची होगी। और एक बात, शहर मकानों से नहीं, हरियाली से भी बनता है। तो कम से कम घर में एक आक्सीजन देने वाला पौधा जरूर लगा लें।
- भव्य श्रीवास्तव

We must think about it. Mr. Bhavya Shrivastav, let me tell that there is big need to create awareness about these things. After all we are dependent on nature and take all the beniefits so how can we become so selfish. We must care about nature, otherwise we’ll destroy. It is our duty to tell these things to people…this is also inqalab…inqalab jindabad… I feel glad to read the whole blog….azadi ki sathwi salgirah mubaraq ho was also excellent and extraordinary article… the article who made me totally mad ….but only few poems are on the mood on inqalab….why?
IT’S REALY VERY SERIOUS MATTER.
GOOD. We must take care of nature.
सही कह रहे हो भाई साहब।