अंधेरे आकाश के नीचे
तारों के साथ
लंबी बात करना
तुम्हे अच्छा लगता है अभी भी
यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है।
जब दुनिया में घिसावट
का दौर चल रहा हो
तब तुम्हारी संवेदना बनी रहे अक्षत
इसे मैं सौभाग्य ही कहूंगा।
पर विश्वास रखो तुम
तुम्हारा कहा ही नहीं
अनकहा भी समझ लेता हूं मैं।
वेदना स्वत: एक संवाद है।
तुम शांति से निकल कर शोर में
गुम हो जाती हो
मैने शोर में ही अपनी शांति पा ली है।
एक दिन जब हम शांत हो जाएंगे
नहीं होंगे शिकवे-शिकायत
पर शोर मचेगा चारों ओर
शायद
और हम रहेंगे नि:शब्द
चिर मौन।
- डॉ. राम प्रकाश द्विवेदी 

बहुत खूबसूरत रचना है महाशय।
bahut badiya
ये कविता ऐसी लगी जैसे खामोशी धीरे धीरे सुनसान सड़क पर चलते मुसाफिर ने लिख दी हो। घिसावट की बात करते हुए आप किसी की अनकही वेदना भी समझ लेते हैं ऐसा लगा जैसे पूंजीवाद की बात करते हुए अचानक कवि ने स््वंय को सांत््वना दे दी हो।