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Archive for May 1st, 2008

 
कितनी उल्फत है
तेरे अल्फाजो में
तू
क्‍यों पूछता है
कौन हूँ
मैं
तेरे फ़साने में
 
खता तक़दीर की कह दूं
कि ख़म ही नहीं
दीवाने में !
 
मेरी दुश्वारियों का खात्मा
गर इक नज़र से है तिरी,
तो क्‍यों रखता है
मेरी मुहब्बत बेगाने में
 
पैगाम-ए-मौत है
हर बार
तेरे आजमाने में
        - अरूणा राय   

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गुलामों की
जुबान नहीं होती
सपने नहीं होते
इश्क तो दूर
जीने की
बात नही होती
मैं कैसे भूल जाऊं
अपनी गुलामी
कि अपना खुदा होना
कभी भूलता नहीं तू …                                                                   
 -अरूणा राय  

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बंदरवाला
हाथ नचा-नचाकर
बजाए जा रहा था डमरू
डिग-डिग, डम-डम
उछलता-कूदता, पीछे-पीछे
बच्चों का मस्तमौला झुंड !
 
दिखी अट्टालिका सामने
डाल दी पोटली
लगा जोर-जोर से बजाने
डिम-डिम डमरू
गाने लगा साथ-साथ
नाच मेरी बुलबुल..!
 
होने लगी
चवन्नी-अठन्नी की
पतझड़-सी बारिश
हनुमान जी समझकर
खिलाने लगे लोग बंदर को
केले-रोटी ।
 
भांति-भांति के करतब
दिखाए जा रहा था बंदर
बढ़ने लगी भीड़ धीरे-धीरे
एक क्षण के लिए रुका बंदर
पतली छड़ी पड़ी उस पर
सटाक…..!
 
बेचारे बंदर ने दृष्टि [...]

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