अनजाने रिश्ते..!
August 16, 2007 by inqalabjindabad
मेरी जिंदगी में शामिल हैं
कुछ नये, कुछ पुराने
और कुछ अनजान-से रिश्ते!
सोचता हूं
क्यूं ना उन अनजाने रिश्तों को
कोई नाम दे दूं
किसी मधुर गीत की तरह गुनगुनाऊं
और खिलखिलाकर निभाऊ उन्हें
किन्तु अतीत ऐसा करने नहीं देता
क्योंकि हरेक रिश्ते ने दिया है मुझे
सिर्फ दुख-दर्द और रिसते हुए जख्म!
खुशी में दौर कर शुमार होते हैं वे
मेरे गम में आंखें नम करते हैं वे
उनका इंतजार रहता है मुझे भी
पता नहीं किस रिश्ते से
किस अधिकार से..!
शायद उनसे है मेरा
कोई अनजाना-सा रिश्ता
जोड़ तो लिया है मैंने
लेकिन मुझे मालूम है
निभाना आसान नहीं
कोई बेनाम-सा रिश्ता!
Posted in मेरी कविताएं, संवाद | 3 Comments
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rishte ek bar jud jate hai to nibhana to padta hai!
rishte hote hi hai nibhane ke lie, par har koi samajh nahi pata.
achhi kavita likhi hai aapne!
very beautifull creation…amazing…
anjaan riste
han sach hai,..
aapse behtar kaun jaan sakta hai,..